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Mantra Rig 08.046.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 46 of Mandal 8 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 1 of Adhyaya 4 of Ashtak 6 of Rig Veda

Mantra 110 of Anuvaak 6 of Mandal 8 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- वशोऽश्व्यः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृदुष्णिक्

स्वर: (Swar) :- ऋषभः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

दधा॑नो॒ गोम॒दश्व॑वत्सु॒वीर्य॑मादि॒त्यजू॑त एधते सदा॑ रा॒या पु॑रु॒स्पृहा॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

दधानो गोमदश्ववत्सुवीर्यमादित्यजूत एधते सदा राया पुरुस्पृहा

 

The Mantra's transliteration in English

dadhāno gomad aśvavat suvīryam ādityajūta edhate | sadā rāyā purusphā ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

दधा॑नः गोऽमत् अश्व॑ऽवत् सु॒ऽवीर्य॑म् आ॒दि॒त्यऽजू॑तः ए॒ध॒ते॒ सदा॑ रा॒या पु॒रु॒ऽस्पृहा॑

 

The Pada Paath - transliteration

dadhāna | go--mat | aśva-vat | su-vīryam | āditya-jūta | edhate | sadā | rāyā | puru-sphā ||



 शिव शंकर शर्मा  Shiv Shankar Sharma

०८।०४६।०मन्त्रविषयः

 

 

भाषार्थः

आदित्यजूतः=आदित्येनेश्वरेण जूतोऽनुगृहीतः। ईशोपासकः। गोमद्=गोप्रभृतिभिर्दुग्धदातृभिः पशुभिः संयुक्तं धनम्। तथा। अश्ववत्=अश्वादिभिर्वहनसमर्थैश्च पशुभिरुपेतां सम्पत्तिम्। पुनः। सुवीर्य्यञ्च। दधानः। एधते। पुनः। पुरुस्पृहा=बहुभिः स्पृहणीयेन। राया=धनेन। सदा एधते ॥५॥

(आदित्यजूतः) परमात्मा के अनुग्रहपात्र ईश्वरोपासक जन (गोमत्) गौ, मेषी आदि दुग्ध देनेवाले पशुओं से युक्त धन पाते हैं तथा (अश्ववत्) वहनसमर्थ गज आदि पशुओं से युक्त सम्पत्ति पाते हैं तथा (सुवीर्य्यम्) वीरतोपेत पुत्र पौत्रादिकों से वे युक्त होते हैं और इनके साथ (एधते) जगत् में प्रतिदिन बढ़ते जाते हैं और (पुरुस्पृहा) जिस धन को बहुत आदमी चाहते, वैसे (राया) धन से युक्त हो (सदा) सदा बढ़ते हैं ॥५॥

 

भावार्थः

 

जो ईश्वर के प्रेमी हैं, उनकी वृद्धि सदा होती है। इसमें कारण यह है कि वह भक्त सबसे प्रेम रखता है। सबके सुख-दुःख में सम्मिलित होता, सत्यता से वह अणुमात्र भी डिगता नहीं, अतः लोगों की सहानुभूति और ईश्वर की दया से वह प्रतिदिन बढ़ता जाता है ॥५॥

 

टीका

 

 





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