Rig Veda‎ > ‎Mandal 08‎ > ‎Sukta 045‎ > ‎

Mantra Rig 08.045.040

MANTRA NUMBER:

Mantra 40 of Sukta 45 of Mandal 8 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 49 of Adhyaya 3 of Ashtak 6 of Rig Veda

Mantra 103 of Anuvaak 6 of Mandal 8 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- त्रिशोकः काण्वः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

भि॒न्धि विश्वा॒ अप॒ द्विष॒: परि॒ बाधो॑ ज॒ही मृध॑: वसु॑ स्पा॒र्हं तदा भ॑र

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

भिन्धि विश्वा अप द्विषः परि बाधो जही मृधः वसु स्पार्हं तदा भर

 

The Mantra's transliteration in English

bhindhi viśvā apa dvia pari bādho jahī mdha | vasu spārha tad ā bhara ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

भि॒न्धि विश्वाः॑ अप॑ द्विषः॑ परि॑ बाधः॑ ज॒हि मृधः॑ वसु॑ स्पा॒र्हम् तत् भ॒र॒

 

The Pada Paath - transliteration

bhindhi | viśvā | apa | dvia | pari | bādha | jahi | mdha | vasu | spārham | tat | ā | bhara ||


शिव शंकर शर्मा Shiv Shankar Sharma

०८।०४५।४०

मन्त्रविषयः

 

 

 

भाषार्थः

हे विश्वम्भर इन्द्र ! मम प्रार्थनां श्रुत्वा विश्वाः सर्वाः। द्विषः=द्वेष्टॄः प्रजाः। अपभिन्धि=दूरी कुरु। तथा बाधः=बाधयित्रीः। मृधः=संग्रामान्। परिजहि=परिहर। तत्=ततः। स्पार्हम्=स्पृहणीयम्। वसु=धनम्। जगति। आभर=पूरय ॥४०॥

हे विश्वम्भर इन्द्र ! मेरी प्रार्थना सुनकर (विश्वाः) समस्त (द्विषः) द्वेष करनेवाली प्रजाओं को (अपभिन्धि) इस संसार से उठा लो। और (बाधः) बाधाएँ डालनेवाले (मृधः) संग्रामों को भी (परि+जहि) निवारण करो। (तत्) तब इस संसार में (स्पार्हम्) स्पृहणीय (वसु) धन को (आभर) भर दो ॥४०॥

 

भावार्थः

 

इस संसार में द्वेष करनेवाली मनुष्जाति या पशुप्रभृति जातियाँ कितनी हानि करनेवाली हैं, यह प्रत्यक्ष है और उन्मत्त स्वार्थी राजा लड़कर कितनी बाधाएँ सन्मार्ग में फैलाते हैं, यह भी प्रत्यक्ष ही है, अतः इन दोनों उपद्रवों से छूटने के लिये वारंवार वेद में प्रार्थना आती है और इन दोनों के अभाव होने से ही संसार में सुख पहुँचता है। इत्यादि ॥४०॥

 

टीका

 

 





Comments