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Mantra Rig 08.043.032

MANTRA NUMBER:

Mantra 32 of Sukta 43 of Mandal 8 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 35 of Adhyaya 3 of Ashtak 6 of Rig Veda

Mantra 32 of Anuvaak 6 of Mandal 8 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- विरूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्वम॑ग्ने वि॒भाव॑सुः सृ॒जन्त्सूर्यो॒ र॒श्मिभि॑: शर्ध॒न्तमां॑सि जिघ्नसे

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्वमग्ने विभावसुः सृजन्त्सूर्यो रश्मिभिः शर्धन्तमांसि जिघ्नसे

 

The Mantra's transliteration in English

sa tvam agne vibhāvasu sjan sūryo na raśmibhi | śardhan tamāsi jighnase ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

सः त्वम् अ॒ग्ने॒ वि॒भाऽव॑सुः सृ॒जन् सूर्यः॑ र॒श्मिऽभिः॑ शर्ध॑न् तमां॑सि जि॒घ्न॒से॒

 

The Pada Paath - transliteration

sa | tvam | agne | vibhāvasu | sjan | sūrya | na | raśmi-bhi | śardhan | tamāsi | jighnase ||



शिव शंकर शर्मा Shiv Shankar Sharma

०८।०४३।३२

मन्त्रविषयः

 

 

 

भाषार्थः

हे अग्ने ! विभावसुः=सर्वेषां भासयिता तथा शर्धन्=समर्थोऽसि। स त्वम्। सृजन्=उद्यन्। सूर्य्यो न=सूर्य्य इव। रश्मिभिः। यथा किरणैः उद्यन् सूर्य्यः। तथा शर्धन्=समर्थस्त्वम्। तमांसि=अज्ञानानि। जिघ्नसे=जहि ॥३२॥

(अग्ने) हे सर्वाधार ईश ! (विभावसुः) जिस कारण आप सबको अपने तेज से प्रकाशित करनेवाले हैं (शर्धन्) और समर्थ हैं, अतः (सः+त्वम्) वह आप (न) जैसे (रश्मिभिः) किरणों से (सृजन्) उदित होता हुआ सूर्य्य अन्धकारों को दूर करता है, तद्वत् (तमांसि) हमारे निखिल अज्ञानों को (जिघ्नसे) दूर कीजिये ॥३२॥

 

भावार्थः

 

परमात्मा के ध्यान और पूजन से अन्तःकरण उज्ज्वल होता जाता है और वह उपासक दिन-२ पाप से छूटता जाता है ॥३२॥

 

टीका

 

 

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