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Mantra Rig 08.041.008

MANTRA NUMBER:

Mantra 8 of Sukta 41 of Mandal 8 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 27 of Adhyaya 3 of Ashtak 6 of Rig Veda

Mantra 163 of Anuvaak 5 of Mandal 8 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- नाभाकः काण्वः

देवता (Devataa) :- वरुणः

छन्द: (Chhand) :- स्वराट्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

स॑मु॒द्रो अ॑पी॒च्य॑स्तु॒रो द्यामि॑व रोहति॒ नि यदा॑सु॒ यजु॑र्द॒धे मा॒या अ॒र्चिना॑ प॒दास्तृ॑णा॒न्नाक॒मारु॑ह॒न्नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

समुद्रो अपीच्यस्तुरो द्यामिव रोहति नि यदासु यजुर्दधे माया अर्चिना पदास्तृणान्नाकमारुहन्नभन्तामन्यके समे

 

The Mantra's transliteration in English

sa samudro apīcyas turo dyām iva rohati ni yad āsu yajur dadhe | sa māyā arcinā padāstṛṇān nākam āruhan nabhantām anyake same ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

सः स॒मु॒द्रः अ॒पी॒च्यः॑ तु॒रः द्याम्ऽइ॑व रो॒ह॒ति॒ नि यत् आ॒सु॒ यजुः॑ द॒धे सः मा॒याः अ॒र्चिना॑ प॒दा अस्तृ॑णात् नाक॑म् अ॒रु॒ह॒त् नभ॑न्ताम् अ॒न्य॒के स॒मे॒

 

The Pada Paath - transliteration

sa | samudra | apīcya | tura | dyām-iva | rohati | ni | yat | āsu | yaju | dadhe | sa | māyā | arcinā | padā | astṛṇāt | nākam | ā | aruhat | nabhantām | anyake | same ||


शिव शंकर शर्मा Shiv Shankar Sharma

०८।०४१।०८

मन्त्रविषयः

 

 

 

भाषार्थः

स वरुणः। समुद्रोऽस्ति=यस्मात् समभिद्रवन्ति भूतानि। तथापि सः। अपीच्यः=सर्वेषां पदार्थानामन्तर्हितोऽस्ति। पुनः। तुरः सर्वेभ्यः शीघ्रतरगामी। सूर्य्या द्यामिव। स सर्वत्र। रोहति। यद्=यश्च पुनः। आसु=प्रजासु। यजुर्दानम्। निदधे। पुनः। सः। माया दुष्टानां कापटानि। अर्चिना=अर्चिष्मता तेजस्विना। पदा=चरणेन। अस्तृणात्=हिनस्ति। स नाकं सुखमयस्थानम्। आरुहत्=प्राप्तोऽस्ति। व्याख्यातमन्यत् ॥८॥

पुनः वरुण का वर्णन करते हैं, (सः) वह वरुण (समुद्रः) समुद्र है अर्थात् जिससे समस्त प्राणी उत्पन्न हों, वह समुद्र। यद्यपि सकल जगद्योगि वह है, तथापि प्रत्यक्ष नहीं, किन्तु (अपीच्यः) सबके मध्य में स्थित है, पुनः (तुरः) सर्व सूर्य्यादि देवों से शीघ्रगामी है पुनः (द्याम्+इव) जैसे सूर्य आकाश में क्रमशः चढ़ता है, तद्वत् वह सबके हृदय में आरूढ़ है। (यद्) जो वरुण (आसु) इन प्रजाओं में (यजुः) दान (नि+दधे) देता है और (सः) वह (मायाः) दुष्टों की कपटताओं को (अर्चिना) ज्वालायुक्त (पदा) पद से (अस्तृणात्) नष्ट कर देता है। वह भगवान् (नाकम्) सुखमय स्थान में (आरुहत्) रहता है ॥८॥

 

भावार्थः

 

जिस कारण वह कपटता नहीं चाहता, अतः निष्कपट होकर उसकी उपासना करो और उसको अपने-२ हृदय में देखो ॥८॥

 

टीका

 

 

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