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Mantra Rig 08.020.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 20 of Mandal 8 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 36 of Adhyaya 1 of Ashtak 6 of Rig Veda

Mantra 152 of Anuvaak 3 of Mandal 8 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- सोभरिः काण्वः

देवता (Devataa) :- मरूतः

छन्द: (Chhand) :- ककुबुष्णिक्

स्वर: (Swar) :- ऋषभः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अच्यु॑ता चिद्वो॒ अज्म॒न्ना नान॑दति॒ पर्व॑तासो॒ वन॒स्पति॑: भूमि॒र्यामे॑षु रेजते

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अच्युता चिद्वो अज्मन्ना नानदति पर्वतासो वनस्पतिः भूमिर्यामेषु रेजते

 

The Mantra's transliteration in English

acyutā cid vo ajmann ā nānadati parvatāso vanaspati | bhūmir yāmeu rejate ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अच्यु॑ता चि॒त् वः॒ अज्म॑न् नान॑दति पर्व॑तासः वन्चस्पतिः॑ भूमिः॑ यामे॑षु रे॒ज॒ते॒

 

The Pada Paath - transliteration

acyutā | cit | va | ajman | ā | nānadati | parvatāsa | vancaspati | bhūmi | yāmeu | rejate ||



 शिव शंकर शर्मा 

०८।०२०।०५

मन्त्रविषयः

सेनागुणान् दर्शयति।

सेना के गुणों को दिखाते हैं।

 

भाषार्थः

हे सेनाजनाः। वः=युष्माकम्। अज्मन्=अजमनि=गमने सति। अच्युताचित्=च्यावयितुमशक्या अपि। पर्वतासः=पर्वताः। पुनः। वनस्पतिः=वनस्पतयोऽपि। नानदति=आभृतो भृशं शब्दायन्ते। अपि च। युष्माकं यामेषु=गमनेषु। भूमिः। रेजते=कम्पते ॥५॥

हे सेनाजनों ! (वः) आपके (अज्मन्) गमन से (अच्युताचित्) सुदृढ और अपतनशील भी (पर्वतासः) पर्वत (वनस्पतिः) और वृक्षादिक भी (नानदति) अत्यन्त शब्द करने लगते हैं (यामेषु) आपके गमन से (भूमिः) पृथिवी भी (रेजते) काँपने लगती है ॥५॥

 

भावार्थः

 

इससे यह सूचित किया गया है कि यदि सेना उच्छृङ्खल हो जाय तो जगत् की बड़ी हानि होती है, अतः उसका शासक देश का परमहितैषी और स्वार्थविहीन हो ॥५॥

नोट−यह यहाँ स्मरण रखना चाहिये कि यह सूक्त बाह्य वायु का भी निरूपक है ॥

 

टीका

 

 




 आर्य मुनि जी Aaryamuni ji


०८।०२०।०५

मन्त्रविषयः



 

भाषार्थः

(वः, अज्मन्) युष्माकं गमने सति (अच्युता, चित्) अच्याव्या अपि (पर्वताः) गिरयः (आनानदति) आशब्दायन्ते (वनस्पतिः) वनस्पतयोऽपि नानदति (यामेषु) यानेषु (भूमिः) पृथिवी (रेजते) कम्पते ॥५ ॥

(वः, अज्मन्) आपके प्रस्थान करने पर (अच्युता, चित्) नहीं हिलने योग्य भी (पर्वताः) पर्वत (आ) चारों ओर से (नानदति) अत्यन्त शब्द करने लगते हैं तथा (वनस्पतिः) वनस्पतिएँ भी शब्दायमान हो जाती हैं (यामेषु) और यात्रा करने पर (भूमिः) पृथिवी (रेजते) काँपने लगती है ॥५ ॥

 

भावार्थः

 

 इस मन्त्र में योद्धाओं के प्रस्थान करने पर जो पर्वतादिकों का शब्दायमान होना कथन किया है वह उपचार से है, या यों कहो कि क्षात्रधर्म का अनुष्ठान करनेवाले योद्धाओं का बल वर्णन किया है कि उनके प्रचण्ड वेग से भूमिस्थ लोक काँपने लगते हैं, जैसे कोई कहे कि भारत का आर्तनाद सुनकर सब लोग करुणारस में प्रवाहित होजाते हैं, इस कथन में “भारत” शब्द भारतवर्ष को नहीं किन्तु भारतदेशनिवासियों में लाक्षणिक होने से मनुष्यों का वाचक है, इसको शास्त्रीय परिभाषा में अलंकार, उपचार वा लक्षणा कहते हैं, लक्ष्यार्थ को समझकर जो वेदार्थ का ज्ञाता होता है, वही इस आशय को समझता है, अन्य नहीं ॥५ ॥

 

टीका

 

 











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