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Mantra Rig 05.014.001

MANTRA NUMBER:
Mantra 1 of Sukta 14 of Mandal 5 of Rig Veda
Mantra 1 of Varga 6 of Adhyaya 1 of Ashtak 4 of Rig Veda
Mantra 118 of Anuvaak 1 of Mandal 5 of Rig Veda


MANTRA DEFINITIONS:
ऋषि:   (Rishi) :- सुतम्भर आत्रेयः
देवता (Devataa) :- अग्निः
छन्द: (Chhand) :- निचृद्गायत्री
स्वर: (Swar) :- षड्जः


THE MANTRA

The Mantra with meters (Sanskrit)
अ॒ग्निं स्तोमे॑न बोधय समिधा॒नो अम॑र्त्यम् । ह॒व्या दे॒वेषु॑ नो दधत् ॥

The Mantra without meters (Sanskrit)
अग्निं स्तोमेन बोधय समिधानो अमर्त्यम् । हव्या देवेषु नो दधत् ॥

The Mantra's transliteration in English
agniṁ stomena bodhaya samidhāno amartyam | havyā deveṣu no dadhat ||

The Pada Paath (Sanskrit)
अ॒ग्निम् । स्तोमे॑न । बो॒ध॒य॒ । स॒म्ऽइ॒धा॒नः । अम॑र्त्यम् । ह॒व्या । दे॒वेषु॑ । नः॒ । द॒ध॒त् ॥

The Pada Paath - transliteration
agnim | stomena | bodhaya | sam-idhānaḥ | amartyam | havyā | deveṣu | naḥ | dadhat ||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

मन्त्र संख्याः

 

संस्कृत

हिन्दी

०५।०१४।०१

मन्त्रविषयः

अथाग्निगुणानाह ।

अब छः ऋचावाले चौदहवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्निगुणों को कहते हैं ।

 

पदार्थः

(अग्निम्) (स्तोमेन) गुणप्रशंसनेन (बोधय) प्रदीपय (समिधानः) सम्यक् स्वयं प्रकाशमानः (अमर्त्यम्) मरणधर्मरहितम् (हव्या) दातुमादातुमर्हाणि वस्तूनि (देवेषु) विद्वत्सु दिव्यगुणपदार्थेषु वा (नः) अस्मभ्यम् (दधत्) दधाति ॥१॥

हे विद्वन् ! जो (समिधानः) उत्तम प्रकार स्वयं प्रकाशमान अग्नि (देवेषु) विद्वानों वा श्रेष्ठ गुणोंवाले पदार्थों में (नः) हम लोगों के लिये (हव्या) देने और ग्रहण करने योग्य वस्तुओं को (दधत्) धारण करता है, उस (अमर्त्यम्) मरणधर्म से रहित (अग्निम्) अग्नि को (स्तोमेन) गुणों की प्रशंसा से (बोधय) प्रकाशित कीजिये ॥१॥

 

अन्वयः

हे विद्वन् ! यस्समिधानोऽग्निर्देवेषु नो हव्या दधत् तममर्त्यमग्निं स्तोमेन बोधय ॥१॥

 

 

भावार्थः

हे मनुष्याः ! प्रयत्नेनाऽग्न्यादिपदार्थविद्यां प्राप्नुत ॥१॥

हे मनुष्यो ! प्रयत्न से अग्नि आदि पदार्थों की विद्या को प्राप्त होओ ॥१॥









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