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Mantra Rig 02.019.009

MANTRA NUMBER:

Mantra 9 of Sukta 19 of Mandal 2 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 24 of Adhyaya 6 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 86 of Anuvaak 2 of Mandal 2 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- गृत्समदः शौनकः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

नू॒नं सा ते॒ प्रति॒ वरं॑ जरि॒त्रे दु॑ही॒यदि॑न्द्र॒ दक्षि॑णा म॒घोनी॑ शिक्षा॑ स्तो॒तृभ्यो॒ माति॑ ध॒ग्भगो॑ नो बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीरा॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

नूनं सा ते प्रति वरं जरित्रे दुहीयदिन्द्र दक्षिणा मघोनी शिक्षा स्तोतृभ्यो माति धग्भगो नो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः

 

The Mantra's transliteration in English

nūna sā te prati vara jaritre duhīyad indra dakiā maghonī | śikā stotbhyo māti dhag bhago no bhad vadema vidathe suvīrā ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

नू॒नम् सा ते॒ प्रति॑ वर॑म् ज॒रि॒त्रे दु॒ही॒यत् इ॒न्द्र॒ दक्षि॑णा म॒घोनी॑ शिक्ष॑ स्तो॒तृऽभ्यः॑ मा अति॑ ध॒क् भगः॑ नः॒ बृ॒हत् व॒दे॒म॒ वि॒दथे॑ सु॒ऽवीराः॑

 

The Pada Paath - transliteration

nūnam | sā | te | prati | varam | jaritre | duhīyat | indra | dakiā | maghonī | śika | stot-bhya | mā | ati | dhak | bhaga | na | bhat | vadema | vidathe | su-vīrā||


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

मन्त्र संख्याः

 

संस्कृत

हिन्दी

०२।०१९।०९

मन्त्रविषयः

अथ दक्षिणागुणानाह ।

अब दक्षिणा के गुणों को कहते हैं ।

 

पदार्थः

(नूनम्) निश्चितम् (सा) विनयाढ्या क्रिया (ते) (प्रति) (वरम्) (जरित्रे) दानस्तावकाय (दुहीयत्) (इन्द्र) (दक्षिणा) (मघोनी) (शिक्ष) विद्या ग्राहय (स्तोतृभ्यः) विद्यामिच्छुभ्यः (मा) (अति) (धक्) दहेत् (भगः) प्रभावम् (नः) अस्मभ्यम् (बृहत्) (वदेम) (विदथे) (सुवीराः) ॥९॥

हे (इन्द्र) विद्वान् आप (नः) हमारे लिये (भगः) प्रभाव को (मा, अति, धक्) मत नष्ट करो और जो (ते) आपकी (मघोनी) ऐश्वर्यवती (दक्षिणा) दक्षिणा (जरित्रे) दान की स्तुति करनेवाले के (वरम्) उत्तम पदार्थ को (दुहीयत्) पूर्ण करे (सा) वह जैसे (नः) हम लोगों के लिये प्राप्त हो वैसे इसको (स्तोतृभ्यः) विद्या की कामना करनेवालों के लिये (शिक्ष) सिखाइये जिससे (सुवीराः) उत्तम वीरोंवाले हमलोग (नूनम्) निश्चय से (विदथे) संग्राम में (बृहत्) बहुत (वदेम) कहें ॥९॥

 

अन्वयः

हे इन्द्र भवान् नो भगो मातिधग्या ते मघोनी दक्षिणा जरित्रे वरं दुहीयत्सा यथा नः प्राप्नुयात्तथैतां स्तोतृभ्यः शिक्षा यतः सुवीरा वयं नूनं विदथे बृहद्वदेम ॥९॥

 

 

भावार्थः

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । यस्याक्षया दक्षिणा शिक्षा चास्ति स वरः सर्वत्र सत्कृतः स्यादिति ॥९॥

अत्र विद्वत्सूर्य्यदातृदक्षिणागुणवर्णनादेतर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥

इत्येकोनविंशतितमं सूक्तं चतुर्विंशो वर्गश्च समाप्तः ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जिसकी अक्षय दक्षिणा और शिक्षा है, वह श्रेष्ठ और सर्वत्र सत्कार को पावे ॥९॥

इस सूक्त में विद्वान् सूर्य दाता और दक्षिणा के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥

यह उन्नीसवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥









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