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Mantra Rig 10.030.009

MANTRA NUMBER:
Mantra 9 of Sukta 30 of Mandal 10 of Rig Veda
Mantra 4 of Varga 25 of Adhyaya 7 of Ashtak 7 of Rig Veda
Mantra 9 of Anuvaak 3 of Mandal 10 of Rig Veda


MANTRA DEFINITIONS:
ऋषि:   (Rishi) :- कवष ऐलूषः
देवता (Devataa) :- आप अपान्नपाद्वा
छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्
स्वर: (Swar) :- धैवतः


THE MANTRA

The Mantra with meters (Sanskrit)
तं सि॑न्धवो मत्स॒रमि॑न्द्र॒पान॑मू॒र्मिं प्र हे॑त॒ य उ॒भे इय॑र्ति । म॒द॒च्युत॑मौशा॒नं न॑भो॒जां परि॑ त्रि॒तन्तुं॑ वि॒चर॑न्त॒मुत्स॑म् ॥

The Mantra without meters (Sanskrit)
तं सिन्धवो मत्सरमिन्द्रपानमूर्मिं प्र हेत य उभे इयर्ति । मदच्युतमौशानं नभोजां परि त्रितन्तुं विचरन्तमुत्सम् ॥

The Mantra's transliteration in English
taṁ sindhavo matsaram indrapānam ūrmim pra heta ya ubhe iyarti | madacyutam auśānaṁ nabhojām pari tritantuṁ vicarantam utsam ||

The Pada Paath (Sanskrit)
तम् । सि॒न्ध॒वः॒ । म॒त्स॒रम् । इ॒न्द्र॒ऽपान॑म् । ऊ॒र्मिम् । प्र । हे॒त॒ । यः । उ॒भे इति॑ । इय॑र्ति । म॒द॒ऽच्युत॑म् । औ॒शा॒नम् । न॒भः॒ऽजाम् । परि॑ । त्रि॒ऽतन्तु॑म् । वि॒ऽचर॑न्तम् । उत्स॑म् ॥

The Pada Paath - transliteration
tam | sindhavaḥ | matsaram | indra-pānam | ūrmim | pra | heta | yaḥ | ubhe iti | iyarti | mada-cyutam | auśānam | nabhaḥ-jām | pari | tri-tantum | vi-carantam | utsam ||



ब्रह्म मुनि जी Brahma Muni ji

१०।०३०।०९

मन्त्रविषयः

 

 

अन्वयार्थः

(सिन्धवः) हे राष्ट्रस्य बन्धयित्र्यः ! (तं मत्सरम्-इन्द्रपानम्-ऊर्मिं प्रहेत) तं हर्षकरं राजपेयं राजग्राह्यं प्रवृद्धं रक्षणसाधनं राज्ञे प्रेरयत-प्रयच्छत (यः-उभे-इयर्ति) यो राज्ञे युष्माभिर्दातव्यो भाग उभे सुखे इहलोकपरलोकविषयके सुखे प्रेरयति प्रयच्छति (मदच्युतम्-औशानं नभोजाम्) राष्ट्रे हर्षप्रचारकं कामना-पूरकमाकाशे प्रसिद्धिप्रसारकम् (त्रितन्तुम्-उत्सं परिविचरन्तम्) त्रयस्तन्तवः पितामह-पितृपुत्राः, तेषां यशो लोके येन भवति तथाभूतम्-उत्कृष्टकरं निजयोगक्षेमत उपरिगतं देयं दातव्यमेव ॥९॥

(सिन्धवः) हे राष्ट्र को थामनेवाली आधारभूत प्रजाओं ! (तं मत्सरम्-इन्द्रपानम्-ऊर्मिं प्रहेत) उस हर्षानेवाले राजा के ग्रहण करने योग्य बढ़े-चढ़े रक्षासाधन भाग को राजा के लिये दो (यः-उभे-इयर्त्ति) जो राजा के लिये तुम्हारे द्वारा देने योग्य भाग है, वह दोनों प्रकार के ऐहिक और पारलौकिक सुखों को प्राप्त कराता है। (मदच्युतम्-औशानं नभोजाम्) राष्ट्र में हर्ष-प्रचारक कामनाओं का पूरक और आकाश में प्रसिद्धि फैलानेवाला (त्रितन्तुम्-उत्सं परि विचरन्तम्) पितामह, पिता और पुत्र के यश को देनेवाले उत्कर्षकारक अपने योगक्षेम से ऊपर-अधिक देने योग्य ही है ॥९॥

भावार्थः

 

प्रजाओं द्वारा राजा के लिये अपने योगक्षेम से बचे हुए दातव्यभाग को देना ही चाहिये। वह राजा के लिए साधिकार प्राप्त करने योग्य है। राजा और प्रजा के लिये राष्ट्र में सुख का संचार करनेवाला उभयलोक-सिद्धि के लिए दातव्य है ॥९॥

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