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Mantra Rig 10.012.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 12 of Mandal 10 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 11 of Adhyaya 6 of Ashtak 7 of Rig Veda

Mantra 95 of Anuvaak 1 of Mandal 10 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हविर्धान आङ्गिः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

किं स्वि॑न्नो॒ राजा॑ जगृहे॒ कद॒स्याति॑ व्र॒तं च॑कृमा॒ को वि वे॑द मि॒त्रश्चि॒द्धि ष्मा॑ जुहुरा॒णो दे॒वाञ्छ्लोको॒ या॒तामपि॒ वाजो॒ अस्ति॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

किं स्विन्नो राजा जगृहे कदस्याति व्रतं चकृमा को वि वेद मित्रश्चिद्धि ष्मा जुहुराणो देवाञ्छ्लोको यातामपि वाजो अस्ति

 

The Mantra's transliteration in English

ki svin no rājā jaghe kad asyāti vrata cakmā ko vi veda | mitraś cid dhi mā juhurāo devāñ chloko na yātām api vājo asti ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

किम् स्वि॒त् नः॒ राजा॑ ज॒गृ॒हे॒ कत् अ॒स्य॒ अति॑ व्र॒तम् च॒कृ॒म॒ कः वि वे॒द॒ मि॒त्रः चि॒त् हि स्म॒ जु॒हु॒रा॒णः दे॒वान् श्लोकः॑ या॒ताम् अपि॑ वाजः॑ अस्ति॑

 

The Pada Paath - transliteration

kim | svit | na | rājā | jaghe | kat | asya | ati | vratam | cakma | ka | vi | veda | mi tra | cit | hi | sma | juhurāa | devān | śloka | na | yātām | api | vāja | asti ||



ब्रह्म मुनि जी Brahma Muni ji

१०।०१२।०५

मन्त्रविषयः

 

 

अन्वयार्थः

(राजा नः किं स्वित्-जगृहे) ज्ञानप्रकाशेन राजमानः परमात्माऽस्माकं किं हि खलु स्तुतिवचनं स्वीकुर्यात् (अस्य कत्-व्रतम्-अतिचकृम) अस्य किं कथम्भूतं व्रतं कर्म विधानं शासनं वयमत्यन्तं सेवेमहि, इति (कः-विवेद) कश्चन भाग्यशाली धीरो विविच्य वेत्तुमर्हति (जुहुराणः) आहूयमानः (मित्रः-चित्-हि-स्म) स तु मित्र इव हि खलु (श्लोकः-देवान् न याताम्) स स्तुतिश्रवणसमर्थः सत्यस्तुति-संयुक्तः श्लोकः शृणोतेः” [निरु०९।६]श्लोकः सत्यवाक्संपृक्तः” [यजु०११।५ दयानन्दः] न सम्प्रत्यर्थे, अस्मान्-उपासकान् मुमुक्षून् प्राप्नोति (वाजः-अस्ति) मुमुक्षूणां वाजोऽमृतभोगोऽस्ति अमृतोऽन्नं वै वाजः” [जै०२।१९३] ॥५॥

(राजा) ज्ञानप्रकाश से राजमान परमात्मा (नः) हमारे (किं स्वित्-जगृहे) किस ही स्तुतिवचन को ग्रहण कर सके-स्वीकार कर सके (अस्य कत्-व्रतम्) इसके किस कर्मविधान शासन को (अतिचकृम) हम अत्यन्त सेवन करें, यह (कः विवेद) कोई भाग्यशाली धीर विवेचन करके जान सकता है (जुहुराणः) बुलाया जाता हुआ-प्रार्थित किया जाता हुआ (मित्रः-चित्-हि-स्म) वह तो मित्रसमान ही (श्लोकः-देवान्-न याताम्) स्तुति सुनने में समर्थ सत्यस्तुति से संयुक्त हुआ हम उपासक मुमुक्षुओं को प्राप्त होवे, (वाजः-अस्ति) मुमुक्षुओं का अमृतभोग है ॥५॥

भावार्थः

 

परमात्मा को कौन सा स्तुतिवचन स्वीकार होता है तथा उसके किस कर्मशासन आदेश-उपदेश का आचरण या पालन करना चाहिए, यह तो उपासक धीर मुमुक्षु जान सकता है। वह ऐसे मुमुक्षु उपासक का बुलाने स्मरण करने योग्य मित्र है, स्तुति को सुननेवाला, स्तुति सुनने में समर्थ, अमृत भोग देनेवाला उन्हें प्राप्त हो जाता है ॥५॥





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