Rig Veda‎ > ‎Mandal 10‎ > ‎Sukta 012‎ > ‎

Mantra Rig 10.012.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 12 of Mandal 10 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 11 of Adhyaya 6 of Ashtak 7 of Rig Veda

Mantra 94 of Anuvaak 1 of Mandal 10 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हविर्धान आङ्गिः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अर्चा॑मि वां॒ वर्धा॒यापो॑ घृतस्नू॒ द्यावा॑भूमी शृणु॒तं रो॑दसी मे अहा॒ यद्द्यावोऽसु॑नीति॒मय॒न्मध्वा॑ नो॒ अत्र॑ पि॒तरा॑ शिशीताम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अर्चामि वां वर्धायापो घृतस्नू द्यावाभूमी शृणुतं रोदसी मे अहा यद्द्यावोऽसुनीतिमयन्मध्वा नो अत्र पितरा शिशीताम्

 

The Mantra's transliteration in English

arcāmi vā vardhāyāpo ghtasnū dyāvābhūmī śṛṇuta rodasī me | ahā yad dyāvo 'sunītim ayan madhvā no atra pitarā śiśītām ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अर्चा॑मि वा॒म् वर्धा॑य अपः॑ घृ॒त॒स्नू॒ इति॑ घृतऽस्नू द्यावा॑भूमी॒ इति॑ शृ॒णु॒तम् रो॒द॒सी॒ इति॑ मे॒ अहा॑ यत् द्यावः॑ असु॑ऽनीतिम् अय॑न् मध्वा॑ नः॒ अत्र॑ पि॒तरा॑ शि॒शी॒ता॒म्

 

The Pada Paath - transliteration

arcāmi | vām | vardhāya | apa | ghtasnūitighta-snū | dyāvābhūmī iti | śṛṇutam | rodasī iti | me | ahā | yat | dyāva | asu-nītim | ayan | madhvā | na | atra | pitarā | śiśītām ||



ब्रह्म मुनि जी Brahma Muni ji

१०।०१२।०४

मन्त्रविषयः

 

 

अन्वयार्थः

(घृतस्नू) हे तेजसो जलस्य च सम्भाजयितारौ घृतस्नूर्घृतसानिन्यः” [निरु०१२।३६] (रोदसी) रोधसी रोधस्वतौ संरक्षकौ रोदसी रोधसी रोधः कूलं निरुणद्धि स्रोतः” [निरु०६।१] (द्यावाभूमी) सूर्यपृथिव्याविव (पितरा) मातापितरौ ज्ञानप्रकाशजीवनरसप्रदातारौ (वाम्-अर्चामि) युवां स्तौमि-इत्यत्र त्वामग्निं परमात्मानं सूर्यरूपं भूमिरूपं मातृरूपं पितृरूपं ज्ञानप्रकाशदातारं जीवनरसदातारं त्वां स्तौमि (अपः-वर्धाय) कर्मक्षेत्रस्य जीवनस्य वर्धनाय अपः कर्मनाम” [निघ०२।१]मतुब्लोपश्छान्दसः’ (मे शृणुतम्) मम प्रार्थनावचनं शृणु (यत्-अहा द्यावः) यतो हि दिनानि द्युसंलग्नत्वादत्र रात्रयोऽपेक्ष्यन्ते रात्रयश्च (असुनीतिम्-अयन्) प्राणनयनशक्तिं जीवनशक्तिं प्राप्नुवन्तु असुनीतिरसून् नयति” [निरु०१०।३९] (अत्र) अस्मिन् जीवने (नः) अस्मभ्यम् (मध्वा शिशीताम्) निजमधुरसुखानि मध्वाइत्यात् प्रत्ययः [अष्टा०७।१।३९] दत्तम्-देहि शिशीतिर्दानकर्मा” [निरु०५।२३] ॥४॥

(घृतस्नू) हे तेज और जल के सम्भाजन करानेवाले (रोदसी) अनर्थों से रोधने-रोकनेवाले संरक्षको (द्यावाभूमी) सूर्य और पृथिवी के समान (पितरा वाम्-अर्चामि) मातापिताओं ! तुम्हारी अर्चना स्तुति करता हूँ-तुझ माता और पिता रूप परमात्मा की स्तुति करता हूँ (अपः वर्धाय) कर्मक्षेत्र या कर्मसाधन जीवन की वृद्धि के लिए (मे शृणुतम्) मेरे प्रार्थना-वचन को सुनो (यत्) कि (अहा द्यावः) दिन और रातें (असुनीतिम्-अयन्) प्राणनयनशक्ति-जीवनशक्ति की ओर चलावें, प्राप्त करावें (अत्र) इस जीवन में (नः) हमारे लिए (मध्वा शिशीताम्) निज मधुर सुखों को प्रदान करें ॥४॥

भावार्थः

 

माता-पिता बालक को संरक्षण, पोषण, स्नेह से पालते हैं, परमात्मा भी माता-पिता के समान या सूर्य पृथिवी के समान प्रकाश और स्निग्ध रस-दूध पिलाता है। दिन रात का विभागकर्ता वही परमात्मा है ॥४॥





Comments