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Mantra Rig 10.012.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 12 of Mandal 10 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 11 of Adhyaya 6 of Ashtak 7 of Rig Veda

Mantra 93 of Anuvaak 1 of Mandal 10 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हविर्धान आङ्गिः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- विराट्त्रिस्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

स्वावृ॑ग्दे॒वस्या॒मृतं॒ यदी॒ गोरतो॑ जा॒तासो॑ धारयन्त उ॒र्वी विश्वे॑ दे॒वा अनु॒ तत्ते॒ यजु॑र्गुर्दु॒हे यदेनी॑ दि॒व्यं घृ॒तं वाः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

स्वावृग्देवस्यामृतं यदी गोरतो जातासो धारयन्त उर्वी विश्वे देवा अनु तत्ते यजुर्गुर्दुहे यदेनी दिव्यं घृतं वाः

 

The Mantra's transliteration in English

svāvg devasyāmta yadī gor ato jātāso dhārayanta urvī | viśve devā anu tat te yajur gur duhe yad enī divya ghta ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

स्वावृ॑क् दे॒वस्य॑ अ॒मृत॑म् यदि॑ गोः अतः॑ जा॒तासः॑ धा॒र॒य॒न्ते॒ उ॒र्वी इति॑ विश्वे॑ दे॒वाः अनु॑ तत् ते॒ यजुः॑ गुः॒ दु॒हे यत् एनी॑ दि॒व्यम् घृ॒तम् वारिति॒ वाः

 

The Pada Paath - transliteration

svāvk | devasya | amtam | yadi | go | ata | jātāsa | dhārayante | urvī iti | viśve | devā | anu | tat | te | yaju | gu | duhe | yat | enī | divyam | ghtam | vārit ivā||



ब्रह्म मुनि जी Brahma Muni ji

१०।०१२।०३

मन्त्रविषयः

 

 

अन्वयार्थः

(गोः-देवस्य) सर्वत्र प्रापणशीलस्य परमात्मदेवस्य (स्वावृक्) निजावर्जितम् स्वपूर्वात् वृजी वर्जने, इत्यस्मादाङ्पूर्वात् क्विप्-औणादिकः सर्वलिङ्गःस्वस्मिन् शाश्वतिकं स्थितम् (अमृतम्) अनश्वरसुखम् (यत्-इ) यतोऽस्ति तस्मात् (उर्वी) द्यावापृथिव्यौ-द्यावापृथिव्योर्मध्ये विभक्तिव्यत्ययःद्यावापृथिवीमये जगति उर्वी द्यावापृथिवीनाम” [निघ०३।३०] (विश्वे देवाः-धारयन्ति) परमात्मनि प्रवेशशीला मुमुक्षवो जीवान्मुक्ताः धारयन्ति (ते तत्-यजुः-अनुगुः) हे परमात्मदेव ! ते तव यजुर्यजनं दानमनुगायन्ति प्रशंसन्ति (यत्-एनी दिव्यं घृतं वाः-दुहे) यथा काचित् नदी एन्यो नद्यः” [निघ०१।१३] दिव्यं तेजोरूपं जलं वहेदिति तथा त्वममृतं प्रवहसि तेजो वै घृतम्” [मै०१।६।८] ॥३॥

(गोः देवस्य) सर्वत्र व्यापनशील परमात्मदेव का (स्वावृक्) स्वतःप्राप्त (अमृतम्) अनश्वर सुख को (यत्-इ) यतः (उर्वी) द्यावापृथिवीमय जगत् में (विश्वे देवाः-धारयन्ति) परमात्मा में प्रवेश करनेवाले मुमुक्षु जीवन्मुक्त विद्वान् धारण करते हैं-प्राप्त करते हैं (ते तत्-यजुः-अनुगुः) तेरे इस यजनदान को वे अनुरूपगान प्रशंसन करते हैं (यत्-एनी दिव्यं घृतं वाः-दुहे) जैसे कोई नदी दिव्य तेजस्वी जल को दोह रही होती है ॥३॥

भावार्थः

 

सर्वत्र व्याप्त परमात्मा के अपने निजी अनश्वर सुख को जीवन्मुक्त धारण करते हैं। उन्हें ऐसा लगता है, जैसे नदी दिव्य जल रिसा रही है। उसे पाकर वे उसका गान स्तवन करते हैं ॥३॥





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