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Mantra Rig 10.012.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 12 of Mandal 10 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 11 of Adhyaya 6 of Ashtak 7 of Rig Veda

Mantra 91 of Anuvaak 1 of Mandal 10 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हविर्धान आङ्गिः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- विराट्त्रिस्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

द्यावा॑ ह॒ क्षामा॑ प्रथ॒मे ऋ॒तेना॑भिश्रा॒वे भ॑वतः सत्य॒वाचा॑ दे॒वो यन्मर्ता॑न्य॒जथा॑य कृ॒ण्वन्त्सीद॒द्धोता॑ प्र॒त्यङ्स्वमसुं॒ यन्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

द्यावा क्षामा प्रथमे ऋतेनाभिश्रावे भवतः सत्यवाचा देवो यन्मर्तान्यजथाय कृण्वन्त्सीदद्धोता प्रत्यङ्स्वमसुं यन्

 

The Mantra's transliteration in English

dyāvā ha kāmā prathame tenābhiśrāve bhavata satyavācā | devo yan martān yajathāya kṛṇvan sīdad dhotā pratya svam asu yan ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

द्यावा॑ ह॒ क्षामा॑ प्र॒थ॒मे इति॑ ऋ॒तेन॑ अ॒भि॒ऽश्रा॒वे भ॒व॒तः॒ स॒त्य॒ऽवाचा॑ दे॒वः यत् मर्ता॑न् य॒जथा॑य कृ॒ण्वन् सीद॑त् होता॑ प्र॒त्यङ् स्वम् असु॑म् यन्

 

The Pada Paath - transliteration

dyāvā | ha | kāmā | prathame iti | tena | abhi-śrāve | bhavata | satya-vācā | deva | yat | martān | yajathāya | kṛṇvan | sīdat | hotā | pratya | svam | asum | yan ||



ब्रह्म मुनि जी Brahma Muni ji

१०।०१२।०१

मन्त्रविषयः

अस्मिन् सूक्तेऽग्निशब्देन परमात्मा विद्वान् पुरोहितो राजा चोच्यन्ते मोक्षराजधर्मौ च विषयौ प्रतिपाद्येते।

इस सूक्त में अग्नि शब्द से परमात्मा विद्वान् पुरोहित और राजा कहे हैं, तथा मोक्ष तथा राजधर्म विषय प्रतिपादित हैं।

अन्वयार्थः

(ऋतेन-सत्यवाचा-अभिश्रावे) ज्ञानेन सत्यवचनेन च खल्वभितः श्रावयितुं यद् वा बोधयितुं (प्रथमे ह द्यावाक्षामा भवतः) अवश्यं प्रारम्भिकौ मातापितरौ प्रकृष्टतमौ राजराज्ञ्यौ वा स्तः (देवः) परमात्मदेवः-विद्वान् पुरोहिता वा (मर्तान् यजथाय यत् कृण्वन्) मनुष्यान् प्रजाजनान् यज्ञानुष्ठानाय सबोधान् कुर्वन्, राजसूययज्ञाय समुद्यतान् कुर्वन् (होता सीदत्) ज्ञानग्राहयिता परमात्मा प्रथमजनानां हृदये सीदति पुरोहितो वा वेद्यां तिष्ठति (प्रत्यङ् स्वम्-असुं यन्) साक्षात् स्वीयं प्राणमात्मभावं प्राप्नुवन् ॥१॥

(ऋतेन सत्यवाचा-अभिश्रावे) ज्ञान और सत्यवचन से सब पर प्रसिद्ध करने के निमित्त (प्रथमे ह द्यावाक्षामा भवतः) प्रारम्भ सृष्टि में प्रसिद्ध मातापिता या प्रकृष्ट राजा राणी है (देवः) परमात्मा या पुरोहित (मर्तान् यजथाय यत् कृण्वन्) मनुष्यों को, प्रजाजनों को यज्ञानुष्ठान के लिए या राजसूययज्ञ के लिए समुद्यत करता हुआ (प्रत्यङ् स्वम्-असुं यन्) साक्षात् अपना प्राण आत्मभाव प्राप्त करता हुआ (होता सीदत्) ज्ञानदाता परमात्मा प्रथमजनों ऋषियों के हदय में प्राप्त होता है या पुरोहित राजसूय वेदि पर बैठता है ॥१॥

भावार्थः

 

आरम्भसृष्टि के प्रकृष्ट माता-पिताओं को ज्ञान और सत्यवाणी द्वारा घोषित कराने के निमित्त परमात्मा उनके हृदय में बैठ अध्यात्म-यज्ञ कराता है तथा श्रेष्ठ राजा राणी को राजसूय कराने के निमित्त विद्वान् पुरोहित अपनाकर वेदि पर बैठता है ॥१॥





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