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Mantra Rig 10.005.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 5 of Mandal 10 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 33 of Adhyaya 5 of Ashtak 7 of Rig Veda

Mantra 33 of Anuvaak 1 of Mandal 10 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- त्रितः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

स॒प्त स्वसॄ॒ररु॑षीर्वावशा॒नो वि॒द्वान्मध्व॒ उज्ज॑भारा दृ॒शे कम् अ॒न्तर्ये॑मे अ॒न्तरि॑क्षे पुरा॒जा इ॒च्छन्व॒व्रिम॑विदत्पूष॒णस्य॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

सप्त स्वसॄररुषीर्वावशानो विद्वान्मध्व उज्जभारा दृशे कम् अन्तर्येमे अन्तरिक्षे पुराजा इच्छन्वव्रिमविदत्पूषणस्य

 

The Mantra's transliteration in English

sapta svasr aruīr vāvaśāno vidvān madhva uj jabhārā dśe kam | antar yeme antarike purājā icchan vavrim avidat pūaasya ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

स॒प्त स्वसॄः॑ अरु॑षीः वा॒व॒शा॒नः वि॒द्वान् मध्वः॑ उत् ज॒भा॒र॒ दृ॒शे कम् अ॒न्तः ये॒मे॒ अ॒न्तरि॑क्षे पु॒रा॒ऽजाः इ॒च्छन् व॒व्रिम् अ॒वि॒द॒त् पू॒ष॒णस्य॑

 

The Pada Paath - transliteration

sapta | svasṛṝḥ | aruī | vāvaśāna | vidvān | madhva | ut | jabhāra | dśe | kam | anta | yeme | antarike | purājā | icchan | vavrim | avidat | pūaasya ||



ब्रह्म मुनि जी Brahma Muni ji


१०।००।०

मन्त्रविषयः

 

 

 

अन्वयार्थः

(विद्वान्) वेद्यमानो ज्ञायमानोऽग्निः, कर्मणि कर्तृप्रत्ययो व्यत्ययेन (सप्त स्वसॄः-अरुषीः-वावशानः) सप्तसंख्याकाः सप्तवर्णास्तमांसि सु सम्यक् क्षेप्त्रीः “स्वसा सु-असा” [निरु० ११।३२] आरोचमानाः-रश्मीन् भृशं प्रकाशयन् (दृशे) संसारं दर्शयितुम् (मध्वः-उज्जभार कम्) मधुमयात्-जलमयाकाशादुद्भावितान् करोति (अन्तरिक्षे-अन्तः) अन्तरिक्षस्याभ्यन्तरे (पुराजाः) पूर्वप्रसिद्धः सूर्यः (येमे) तान् रश्मीन् नियन्त्रयति (पूषणस्य वव्रिम्-इच्छन्-अविदत्) पृथिव्याः-रूपं=प्रकाशमिच्छन्निव पृथिवीं प्राप्तवान् ॥॥

(विद्वान् जानने योग्य अग्निसूर्यरूप (सप्त स्वसॄः-अरुषीः-वावशानः) सात रङ्गवाली अन्धकार को सम्यक् रूप से हटानेवाली आरोचमान रश्मियों को बहुत प्रकाश देता हुआ (दृशे) संसार को दिखाने-दृष्ट करने के लिए (मध्वः-उज्जभार कम्) जलमय आकाश से उभारता है (अन्तरिक्षे-अन्तः-पुराजाः) जो अन्तरिक्ष के अन्दर पूर्व से प्रसिद्ध होता है। (येमे) उन रश्मियों को नियन्त्रित रखता है (पूषणस्य वव्रिम्-इच्छन्-अविदत्) पृथिवी के रूप-स्वरूप को प्रकाशित करने की इच्छा करते हुए जैसा ॥॥

 

भावार्थः

 

सूर्य अपनी सात रङ्गवाली किरणों को जगत् को दृष्ट कराने के लिए जलमय आकाश से बाहर निकालता या उभारता है, जो जलमय आकाश में स्वयं प्रथम गुप्त रखता है, पुनः पृथिवी को भी स्वरूप देता है, जल को शोषित कर तथा बहाकर जलमय आकाश में बाहर दृष्ट कराता है। इसी प्रकार सूर्यसमान राजमान राजा सप्त व्यवस्थाओं को राष्ट्र में प्रचारित कर उनसे राष्ट्र को चमकावे, सब प्रकार से पुष्ट करे ॥॥





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