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Mantra Rig 10.002.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 2 of Mandal 10 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 30 of Adhyaya 5 of Ashtak 7 of Rig Veda

Mantra 12 of Anuvaak 1 of Mandal 10 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- त्रितः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यत्पा॑क॒त्रा मन॑सा दी॒नद॑क्षा॒ य॒ज्ञस्य॑ मन्व॒ते मर्त्या॑सः अ॒ग्निष्टद्धोता॑ क्रतु॒विद्वि॑जा॒नन्यजि॑ष्ठो दे॒वाँ ऋ॑तु॒शो य॑जाति

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यत्पाकत्रा मनसा दीनदक्षा यज्ञस्य मन्वते मर्त्यासः अग्निष्टद्धोता क्रतुविद्विजानन्यजिष्ठो देवाँ ऋतुशो यजाति

 

The Mantra's transliteration in English

yat pākatrā manasā dīnadakā na yajñasya manvate martyāsa | agni ad dhotā kratuvid vijānan yajiṣṭho devām̐ tuśo yajāti ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यत् पा॒क॒ऽत्रा मन॑सा दी॒नऽद॑क्षाः य॒ज्ञस्य॑ म॒न्व॒ते मर्त्या॑सः अ॒ग्निः तत् होता॑ क्र॒तु॒ऽवित् वि॒ऽजा॒नन् यजि॑ष्ठः दे॒वान् ऋ॒तु॒ऽशः य॒जा॒ति॒

 

The Pada Paath - transliteration

yat | pāka-trā | manasā | dīna-dakā | na | yajñasya | manvate | martyāsa | agni | tat | hotā | kratu-vit | vi-jānan | yajiṣṭha | devān | tu-śa | yajāti ||



ब्रह्म मुनि जी Brahma Muni ji


१०।००२।०५

मन्त्रविषयः

 

 

अन्वयार्थः

(पाकत्रा-मनसा) पक्तव्येनार्थादविपक्वेनपाकः पक्तव्यः” [निरु० ६।१२] “देव....द्वितीयासप्तम्योर्बहुलम्” [अष्टा० ५।४।५६] बहुलग्रहणात् तृतीयायां वा प्रत्ययः, मनसा (दीनदक्षाः) क्षीणज्ञानबलाः (मर्त्यासः) मनुष्याः (यज्ञस्य मन्वते) यज्ञं भुवनज्येष्ठं द्युमण्डलम्यज्ञो वै भुवनज्येष्ठः” [कौ० २५।११] “यज्ञो वै भुवनम्” [तै० ३।३।७।५] द्वितीयार्थे षष्ठी व्यत्ययेन, खलु जानन्ति (यत्-होता-क्रतुवित्-अग्निः-तत्-विजानन्) यत् ग्रहीता स्वाश्रये स्थापयिता, क्रियावन्तं ग्रहादिकं स्वाश्रये लब्धा प्रापयिता महान्-अग्निः-सूर्यो विज्ञायमानः, “कर्मणि कर्त्तृप्रत्ययः” (यजिष्ठः) अतिशयेन सर्वैः सह सङ्गतः (ऋतुशः-देवान् यजाति) कालशो यथाकालं ग्रहान् तद्गत्यां सङ्गमयति संयोजयति ॥५॥

(पाकत्रा-मनसा) पकने योग्य- पके अल्पज्ञानवाले मन से (दीनदक्षाः) क्षीण ज्ञानबलवाले या क्षीण आत्मबलवाले (मर्त्यासः) मनुष्य (यज्ञस्य मन्वते) द्युमण्डलरूप यज्ञ को नहीं समझते हैं, (यत्-होता-क्रतुवित्-अग्निः-तत्-विजानन्) कि स्वाश्रय में ग्रहों को ग्रहण-स्थापन करनेवाला, कियावाले गतिशीलग्रह आदि को अपने आश्रय में लेनेवाला महान् अग्नि सूर्य विज्ञान में आया हुआ (यजिष्ठः) अत्यन्त संयुक्त होनेवाला प्रेरक (ऋतुशः-देवान् यजाति) समयानुसार-कालव्यवस्था से-कालक्रम से ग्रहों को उनकी गति से युक्त करता है ॥५॥

भावार्थः

 

जनसाधारण अल्पज्ञान के कारण नहीं जानते कि द्युमण्डल में ग्रह तारों को सूर्य अपने आश्रय में रखकर, उनका आकर्षण बल से कालक्रम में गतिप्रेरक है, यह ज्योतिर्वित् ही जानते हैं। अल्पज्ञान के कारण जो मनुष्य पदार्थों को समझने में असमर्थ हों और उनके प्रयोग को जान सकें, तो उन्हें ज्योतिर्विद्वानों से जानना चाहिये ॥५॥





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