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Mantra Rig 10.002.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 2 of Mandal 10 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 30 of Adhyaya 5 of Ashtak 7 of Rig Veda

Mantra 11 of Anuvaak 1 of Mandal 10 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- त्रितः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यद्वो॑ व॒यं प्र॑मि॒नाम॑ व्र॒तानि॑ वि॒दुषां॑ देवा॒ अवि॑दुष्टरासः अ॒ग्निष्टद्विश्व॒मा पृ॑णाति वि॒द्वान्येभि॑र्दे॒वाँ ऋ॒तुभि॑: क॒ल्पया॑ति

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यद्वो वयं प्रमिनाम व्रतानि विदुषां देवा अविदुष्टरासः अग्निष्टद्विश्वमा पृणाति विद्वान्येभिर्देवाँ ऋतुभिः कल्पयाति

 

The Mantra's transliteration in English

yad vo vayam pramināma vratāni viduā devā aviduṣṭarāsa | agni ad viśvam ā pṛṇāti vidvān yebhir devām̐ tubhi kalpayāti ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

तत् वः॒ व॒यम् प्र॒ऽमि॒नाम॑ व्र॒तानि॑ वि॒दुषा॑म् दे॒वाः॒ अवि॑दुःऽतरासः अ॒ग्निः तत् विश्व॑म् पृ॒णा॒ति॒ वि॒द्वान् येभिः॑ दे॒वान् ऋ॒तुऽभिः॑ क॒ल्पया॑ति

 

The Pada Paath - transliteration

tat | va | vayam | pra-mināma | vratāni | viduām | devā | avidu-tarāsa | agni | tat | viśvam | ā | pṛṇāti | vidvān | yebhi | devān | tu-bhi | kalpayāti ||



ब्रह्म मुनि जी Brahma Muni ji


१०।००२।०४

मन्त्रविषयः

 

 

अन्वयार्थः

(देवाः) हे द्युस्थानिनो ग्रहास्तद्वेत्तारो वा ! (वयम्-अविदुष्टरासः) वयं ज्योतिर्विद्यायां सर्वथाऽज्ञानिनः (वः-विदुषाम्) युष्माकं वेद्यानां विदुषां वा (यत्-व्रतानि-प्रमिनाम) यत् खलु कर्म नियमेन हिंस्मः-उल्लङ्घयेम (अग्निः-विद्वान् तत्-विश्वम्-आपृणाति) सूर्यो ज्ञाननिमित्तः सन् तत् सर्वमापूरयति पूर्णं करोति (येभिः-ऋतुभिः-देवान् कल्पयाति) यैः कालैर्द्युस्थानान् ग्रहादीन् स्वकीयसौरमण्डलस्थे मार्गे गमनाय समर्थान् करोति ॥४॥

(देवाः) हे द्युस्थान के ग्रहों ! (वयम्-अविदुष्टरासः) हम ज्योतिर्विद्या में सर्वथा अज्ञानी (वः-विदुषाम्) तुम ज्योतिर्विद्या के ज्ञाननिमित्तों के (यत्-व्रतानि-प्रमिनाम) जिन कर्मों-नियमों को हिंसित करते हैं-तोड़ते हैं, भूल करते हैं (अग्निः-विद्वान्सूर्य अग्नि ज्ञान का निमित्त हुआ (तत्-विश्वम्-आपृणाति) उस सब को पूरा कर देता है (येभिः-ऋतुभिः-देवान् कल्पयाति) जिन काल क्रियाओं द्वारा वह ग्रहों को अपने सौरमण्डल के गतिमार्ग में गति करने को समर्थ बनाता है ॥४॥

भावार्थः

 

ग्रहों के ज्ञान में अनभिज्ञ जन जो भूल कर देते हैं, सूर्य को ठीक-ठीक समझने पर वह भूल दूर हो जाती है। कारण कि सूर्य ही कालक्रम से ग्रहों को सर्व गति-मार्गों में चलाता है। विद्वानों के शिक्षण में कहीं अपनी अयोग्यता से भूल या भ्रान्ति प्रतीत हो, तो विद्यासूर्य महा विद्वान् से पूर्ति करनी चाहिये ॥४॥





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