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Mantra Rig 10.002.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 2 of Mandal 10 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 30 of Adhyaya 5 of Ashtak 7 of Rig Veda

Mantra 9 of Anuvaak 1 of Mandal 10 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- त्रितः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

वेषि॑ हो॒त्रमु॒त पो॒त्रं जना॑नां मन्धा॒तासि॑ द्रविणो॒दा ऋ॒तावा॑ स्वाहा॑ व॒यं कृ॒णवा॑मा ह॒वींषि॑ दे॒वो दे॒वान्य॑जत्व॒ग्निरर्ह॑न्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

वेषि होत्रमुत पोत्रं जनानां मन्धातासि द्रविणोदा ऋतावा स्वाहा वयं कृणवामा हवींषि देवो देवान्यजत्वग्निरर्हन्

 

The Mantra's transliteration in English

vei hotram uta potra janānām mandhātāsi draviodā tāvā | svāhā vaya kṛṇavāmā havīṁṣi devo devān yajatv agnir arhan ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

वेषि॑ हो॒त्रम् उ॒त पो॒त्रम् जना॑नाम् म॒न्धा॒ता अ॒सि॒ द्र॒वि॒णः॒ऽदाः ऋ॒तऽवा॑ स्वाहा॑ व॒यम् कृ॒णवा॑म ह॒वींषि॑ दे॒वः दे॒वान् य॒ज॒तु॒ अ॒ग्निः अर्ह॑न्

 

The Pada Paath - transliteration

vei | hotram | uta | potram | janānām | mandhātā | asi | dravia-dā | ta-vā | svāhā | vayam | kṛṇavāma | havīṃṣi | deva | devān | yajatu | agni | arhan ||


ब्रह्म मुनि जी Brahma Muni ji


१०।००२।०२

मन्त्रविषयः

 

 

अन्वयार्थः

(जनानां होत्रम्-उत पोत्रम्) जायमानानां प्राणिनां होतव्यं हव्यमदनीयं भोज्यमाहारं तथा पोतव्यं पवित्रीकरणीयं पवनीयं जलं शरीरं शरीरस्वास्थ्यम् (वेषि) प्रापयसि (द्रविणोदाः) धनस्य-नानाधनस्य दाता (ऋतावा) सत्यज्ञानप्रदः-सत्यज्ञानस्य हेतुः (मन्धाता) मनं मननं धापयतीति मन्धाता विचारशक्तिप्रदः (असि) भवसि (वयं हवींषि कृणवाम) वयं बहुविधज्ञानानि सम्पादयेमहविः-आदेयं विज्ञानम्” [ऋ० १।१०।८। दयानन्दः] अथ परोक्षेणोच्यते (अर्हन् अग्निः-देवः-देवान् यजतु) प्रशंसनीयो बृहन् अग्निः सूर्यः कामयमानान् ज्योतिर्विदो विदुषः-सङ्गमयतु स्वज्ञानेन (स्वाहा) इति सुष्ठु ज्ञानम् ॥२॥

(जनानां होत्रम्-उत पोत्रम् वेषि) जायमान प्राणियों का अदनीय-भोगने योग्य-खाने योग्य अन्नादि को और पवित्र करने योग्य जल शरीर को प्राप्त कराता है (द्रविणोदाः) सोना आदि विविध धनों का दाता (ऋतावा) सत्यज्ञान का निमित्त (मन्धाता) मननशक्ति धारण करानेवाला (असि) है (वयं हवींषि कृणवाम) हम बहुविध ज्ञानसम्पादन करें (अर्हन् अग्निः-देवः-देवान् यज) महान् अग्नि सूर्य उसे चाहनेवाले ज्योतिषियों को अपने ज्ञान से संयुक्त करे (स्वाहा) यह अच्छा ज्ञान है ॥२

भावार्थः

 

प्राणियों के भोजन और जीवनरक्षा का निमित्त सूर्य है। वही सोना आदि धन पृथिवी में उत्पत्र करने का भी निमित्त है, सत्यज्ञान मननशक्ति का भी वही दाता है। ज्योतिषी लोग उससे बहुत कुछ ज्ञान लेते हैं। विद्यासूर्य विद्वान् से मनुष्य भोजन-पदार्थ और स्वास्थ्य का ज्ञान करें तथा दानादि कर्तव्य को सीखें ॥२॥





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