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Mantra Rig 10.002.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 2 of Mandal 10 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 30 of Adhyaya 5 of Ashtak 7 of Rig Veda

Mantra 8 of Anuvaak 1 of Mandal 10 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- त्रितः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- पादनिचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

पि॒प्री॒हि दे॒वाँ उ॑श॒तो य॑विष्ठ वि॒द्वाँ ऋ॒तूँॠ॑तुपते यजे॒ह ये दैव्या॑ ऋ॒त्विज॒स्तेभि॑रग्ने॒ त्वं होतॄ॑णाम॒स्याय॑जिष्ठः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

पिप्रीहि देवाँ उशतो यविष्ठ विद्वाँ ऋतूँॠतुपते यजेह ये दैव्या ऋत्विजस्तेभिरग्ने त्वं होतॄणामस्यायजिष्ठः

 

The Mantra's transliteration in English

piprīhi devām̐ uśato yaviṣṭha vidvām̐ tūm̐r tupate yajeha | ye daivyā tvijas tebhir agne tva hotṝṇām asy āyajiṣṭha ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

पि॒प्री॒हि दे॒वान् उ॒श॒तः य॒वि॒ष्ठ॒ वि॒द्वान् ऋ॒तून् ऋ॒तु॒ऽप॒ते॒ य॒ज॒ इ॒ह ये दैव्याः॑ ऋ॒त्विजः॑ तेभिः॑ अ॒ग्ने॒ त्वम् होतॄ॑णाम् अ॒सि॒ आऽय॑जिष्ठः

 

The Pada Paath - transliteration

piprīhi | devān | uśata | yaviṣṭha | vidvān | tūn | tu-pate | yaja | iha | ye | daivyā | tvija | tebhi | agne | tvam | hotṛṝṇām | asi | āyajiṣṭha||



ब्रह्म मुनि जी Brahma Muni ji


१०।००२।०१

मन्त्रविषयः

पूर्ववत्।

 

अन्वयार्थः

(यविष्ठ) हे युवतम ! लोकत्रयेण सह मिश्रणधर्मन् ! (ऋतुपते) हे ऋतूनां स्वामिन् ! पालक ! वा सूर्य ! “ऋतुपाः- ऋतुं पाति रक्षति सूर्यः” [ऋ० ३।४६।२। दयानन्दः] (उशतः-देवान्) स्वां कामयमानान् ज्योतिर्विदो विदुषः (पिप्रीहि) स्वविज्ञानेन प्रीणय (विद्वान्) वेदयन्-ज्ञापयन् ज्ञापनायेत्यर्थःलक्षणहेत्वोः क्रियायाः” [अष्टा० ३।२।१३६] इति हेत्वर्थे शतृप्रत्ययः (इह-ऋतून् यज) अत्र संसारे ऋतून् वसन्तादीन्, कालान्-कालविभागान् वाऋतुभिः कालैः” [निरु० ८।४] सङ्गमययज-सङ्गमय” [ऋ० १।१४।११। दयानन्दः] (ये दैव्याः-ऋत्विजःये खलु मन्त्राःछन्दांसि वा ऋत्विजः” [मै० ३।९।८] अथवा दिशःसप्तर्त्विजः सूर्यः सप्त दिशो नाना सूर्याः [तै० आ० १।७।४] (तेभिः) तैः सह (अग्ने) हे बृहन्-अग्ने सूर्य ! (त्वं होतॄणाम्-आयजिष्ठः-असि) ज्ञानग्रहीतॄणां त्वं समन्तात् सङ्गन्तृतमोऽसि ॥१॥

(यविष्ठहे तीनों लोकों के साथ अत्यन्त संयुक्त होनेवाले (उशतः-देवान्) तुझे चाहनेवाले ज्योतिर्विद्या-ज्ञाता विद्वानों को (पिप्रीहि) अपने विज्ञान से प्रसन्न कर-सन्तुष्ट कर (ऋतुपते) हे ऋतुओं के स्वामी या पालक ! (विद्वान्) उन्हें जनाने के हेतु (इह) इस संसार में (ऋतून् यज) वसन्त आदि ऋतुओं य कालों-कालविभागों-वर्ष, मास, दिन, रात्रि, प्रहर आदि को सङ्गत कर (ये दैव्याः-ऋत्विजः) जो मनुष्यों के नहीं किन्तु देवों-आकाशीय देवों के ऋत्विक् मन्त्र-मननीय वचन, विचार या दिशाएँ हैं (तेभिः) उनके द्वारा (अग्ने त्वम्) हे सूर्य ! तू (होतॄणाम्-आयजिष्ठः) उन ज्ञानग्राहक विद्वानों को सब ओर से अत्यन्त ज्ञानग्रहण करानेवाला है ॥१॥

भावार्थः

 

ज्योतिषी विद्वानों के लिये सूर्य एक ज्ञान ग्रहण कराने का साधन है। ऋतु या कालविभाग सूर्य से ही होते हैं तथा दिशाओं में वर्त्तमान ग्रह, तारे आदि का ज्ञान भी सूर्य से ही मिलता है। विद्यासूर्य विद्वान् के द्वारा दिव्य ज्ञानों की प्राप्ति होती है। वह सुखद समय का निर्माण करता है, जीवनयात्रा की दिशाओं को दिखाता है ॥१॥





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