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Mantra Rig 10.001.007

MANTRA NUMBER:

Mantra 7 of Sukta 1 of Mandal 10 of Rig Veda

Mantra 7 of Varga 29 of Adhyaya 5 of Ashtak 7 of Rig Veda

Mantra 7 of Anuvaak 1 of Mandal 10 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- त्रितः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- स्वराडार्चीत्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

हि द्यावा॑पृथि॒वी अ॑ग्न उ॒भे सदा॑ पु॒त्रो मा॒तरा॑ त॒तन्थ॑ प्र या॒ह्यच्छो॑श॒तो य॑वि॒ष्ठाथा व॑ह सहस्ये॒ह दे॒वान्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

हि द्यावापृथिवी अग्न उभे सदा पुत्रो मातरा ततन्थ प्र याह्यच्छोशतो यविष्ठाथा वह सहस्येह देवान्

 

The Mantra's transliteration in English

ā hi dyāvāpthivī agna ubhe sadā putro na mātarā tatantha | pra yāhy acchośato yaviṣṭhāthā vaha sahasyeha devān ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

हि द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ अ॒ग्ने॒ उ॒भे इति॑ सदा॑ पु॒त्रः मा॒तरा॑ त॒तन्थ॑ प्र या॒हि॒ अच्छ॑ उ॒श॒तः य॒वि॒ष्ठ॒ अथ॑ व॒ह॒ स॒ह॒स्य॒ इ॒ह दे॒वान्

 

The Pada Paath - transliteration

ā | hi | dyāvāpthivī iti | agne | ubhe iti | sadā | putra | na | mātarā | tatantha | pra | yāhi | accha | uśata | yaviṣṭha | atha | ā | vaha | sahasya | iha | devān ||



ब्रह्म मुनि जी Brahma Muni ji


१०।००१।०७

मन्त्रविषयः

 

 

अन्वयार्थः

(यविष्ठ सहस्य-अग्ने) हे युवतम ! लोकत्रयेण सहातिशयेन यौति मिश्रयति संयुक्तो भवति यः यविष्ठः, तथाभूत ! दिवि सूर्यरूपेण, अन्तरिक्षे विद्युद्रूपेण वर्त्तमान सहस्य ! सहसि सामर्थ्ये-आकर्षणे साधुर्यस्तत्सम्बुद्धौ सहस्यसहसा सामर्थ्येनाकर्षणेन वा” [ऋ० १।५१।१। दयानन्दः] पृथिव्यां सर्वकार्याणामग्रणीभूतस्तथाभूत त्वमग्ने बृहन्नग्ने ! (उभे द्यावापृथिवी) उभौ द्युलोकपृथिवीलोकौ (सदा हि-आततन्थ) सर्वदैव सूर्यरूपः सन् स्वप्रकाशेन प्रकाशयति (पुत्रः- मातरा) मातापितरौ यथा पुत्रः स्वगुणाचरणैः प्रकाशयति-प्रसिद्धौ करोति (उशतः अच्छ प्रयाहि) त्वां कामयमानानस्मान् साधुरूपेण प्राप्तो भवसि, अतः (इह देवान्-आवह) अत्र स्वरश्मीन्उदिता देवाः सूर्यस्य” [ऋ०] “आदित्यस्य वै रश्मयो देवाः [तै० सं० ६।४।५।५। ] प्रापय प्रापयसि वा ॥७॥

(यविष्ठ सहस्य-अग्ने) हे युवतम ! तीनों लोकों के साथ अतिशय से संयुक्त होनेवाले ! द्युलोक में सूर्यरूप से तथा अन्तरिक्ष में विद्युद्रूप से वर्त्तमान ! सहस्य ! सह-सामर्थ्य आकर्षणवाले प्रदर्शन में साधुपृथिवी पर सब कार्यों का अग्रणी अग्नि ! (उभे द्यावापृथिवी) दोनों-द्युलोक पृथिवीलोक को (सदा हि- ततन्थ) सर्वदा ही सूर्यरूप हुआ अपने प्रकाश से प्रकाशित करता है (पुत्रः- मातरा) जैसे कि मातापिताओं को पुत्र अपने गुणाचरणों द्वारा प्रकाशित करता है-प्रसिद्ध करता है। (उशतः अच्छ प्रयाहि) तुझे चाहनेवाले हम लोगों को साधुरूप से प्राप्त हो-होता है (इह देवान्-आवह) यहाँ हमारी ओर अपनी किरणों को प्राप्त करता-प्रेरित करता है ॥७॥

भावार्थः

 

सूर्य महान् अग्नि है, वह तीनों लोकों से संयुक्त होता है, द्युलोक में साक्षात् सूर्यरूप से, अन्तरिक्ष में विद्युद्रूप से और पृथिवी पर अग्निरूप से प्रसिद्ध होता है। सूर्य के प्रकाश का जीवन में उपयोग लेना चाहिये। विद्यासूर्य विद्वान् केवल अपने वंश या स्थान में ही ज्ञान का प्रकाश नही करते, किन्तु राष्ट्रभर में अपितु पृथिवीभर में करते हैं ॥७॥





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