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Mantra Rig 10.001.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 1 of Mandal 10 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 29 of Adhyaya 5 of Ashtak 7 of Rig Veda

Mantra 5 of Anuvaak 1 of Mandal 10 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- त्रितः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

होता॑रं चि॒त्रर॑थमध्व॒रस्य॑ य॒ज्ञस्य॑यज्ञस्य के॒तुं रुश॑न्तम् प्रत्य॑र्धिं दे॒वस्य॑देवस्य म॒ह्ना श्रि॒या त्व१॒॑ग्निमति॑थिं॒ जना॑नाम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

होतारं चित्ररथमध्वरस्य यज्ञस्ययज्ञस्य केतुं रुशन्तम् प्रत्यर्धिं देवस्यदेवस्य मह्ना श्रिया त्वग्निमतिथिं जनानाम्

 

The Mantra's transliteration in English

hotāra citraratham adhvarasya yajñasya-yajñasya ketu ruśantam | pratyardhi devasya-devasya mahnā śriyā tv agnim atithi janānām ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

होता॑रम् चि॒त्रऽर॑थम् अ॒ध्व॒रस्य॑ य॒ज्ञस्य॑ऽयज्ञस्य के॒तुम् रुश॑न्तम् प्रति॑ऽअर्धिम् दे॒वस्य॑ऽदेवस्य म॒ह्ना श्रि॒या त्वम् अ॒ग्निम् अति॑थिम् जना॑नाम्

 

The Pada Paath - transliteration

hotāram | citra-ratham | adhvarasya | yajñasya-yajñasya | ketum | ruśantam | prati-ardhim | devasya-devasya | mahnā | śriyā | tvam | agnim | atithim | janānām ||



ब्रह्म मुनि जी Brahma Muni ji


१०।००१।०५

मन्त्रविषयः

 

 

अन्वयार्थः

(अध्वरस्य यज्ञस्य-यज्ञस्य होतारम्) अहिंसनीयस्य-अबाध्यस्य यज्ञमात्रस्य जीवनयज्ञस्य होमयज्ञस्य सम्पादयितारम् (रुशन्तम्-केतुम्) ज्वलन्तं सर्वप्रेरकं सूर्यम् (चित्ररथम्) दर्शनीयमण्डलवन्तं तथा (देवस्य देवस्य प्रत्यर्धिम्) द्योतमानस्य ग्रहनक्षत्रादिकस्यदेवः-द्युस्थानो भवतीति वा” [निरु० ७।१६] दिव्यपदार्थस्य ज्ञानिनो जनस्य प्रतिवर्धकम् (जनानां मह्ना श्रिया तु-अतिथिम्) जन्यमानानां प्राणिनां स्वमहत्या कान्त्या दीप्त्या क्षिप्रं निरन्तरं गमनशीलं प्रवेशकर्त्तारम् (अग्निम्) सूर्यरूपं बृहन्तमग्निं वयं सेवेमहि ॥५॥

(अध्वरस्य यज्ञस्य-यज्ञस्य होतारम्) अहिंसनीय-अबाध्य प्रत्येक जीवन यज्ञ और होमयज्ञ के सम्पादक (रुशन्तम्-केतुम्) प्रकाशमान प्रेरक (चित्ररथम्) दर्शनीय मण्डलवाले (देवस्य देवस्य प्रत्यर्धिम्) प्रत्येक द्योतमान आकाश में प्रकाशमान ग्रह नक्षत्र आदि के और ज्ञानी जन के प्रतिपोषक (जनानां मह्ना श्रिया तु-अतिथिम्) जन्यमान प्राणियों में अपनी महती दीप्ति से शीघ्र-तुरन्त निरन्तर प्रवेश करनेवाले (अग्निम्) महान् अग्नि सूर्य का हम सेवन करें ॥५॥

भावार्थः

 

प्रत्येक जीवनयज्ञ होमयज्ञ का सम्पादक, तथा प्रत्येक ग्रह तारे का प्रकाशक, ज्ञानी जन का उत्साहक, उत्पन्न प्राणियों के अन्दर अपनी दीप्ति द्वारा प्रवेश कर उत्साहित करनेवाला सूर्य है; उसका प्रातः अथवा अन्य विधियों से सेवन करना चाहिये। ऐसे हे विद्यासूर्य विद्वान् ! कर्मपरायण जन के कर्मयाग और ज्ञानीजन के ज्ञानयज्ञ को सम्पन्न करावें, तथा जनमात्र में जीवननिर्वाहक साधनों का प्रवचन करें ॥५॥





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