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Mantra Rig 10.001.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 1 of Mandal 10 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 29 of Adhyaya 5 of Ashtak 7 of Rig Veda

Mantra 4 of Anuvaak 1 of Mandal 10 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- त्रितः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अत॑ त्वा पितु॒भृतो॒ जनि॑त्रीरन्ना॒वृधं॒ प्रति॑ चर॒न्त्यन्नै॑: ता ईं॒ प्रत्ये॑षि॒ पुन॑र॒न्यरू॑पा॒ असि॒ त्वं वि॒क्षु मानु॑षीषु॒ होता॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अत त्वा पितुभृतो जनित्रीरन्नावृधं प्रति चरन्त्यन्नैः ता ईं प्रत्येषि पुनरन्यरूपा असि त्वं विक्षु मानुषीषु होता

 

The Mantra's transliteration in English

ata u tvā pitubhto janitrīr annāvdham prati caranty annai | tā īm praty ei punar anyarūpā asi tva viku mānuīu hotā ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अतः॑ ऊँ॒ इति॑ त्वा॒ पि॒तु॒ऽभृतः॑ जनि॑त्रीः अ॒न्न॒ऽवृध॑म् प्रति॑ च॒र॒न्ति॒ अन्नैः॑ ताः ई॒म् प्रति॑ ए॒षि॒ पुनः॑ अ॒न्यऽरू॑पाः असि॑ त्वम् वि॒क्षु मानु॑षीषु होता॑

 

The Pada Paath - transliteration

ata | o iti | tvā | pitu-bhta | janitrī | anna-vdham | prati | caranti | annai | tā | īm | prati | ei | puna | anya-rūpā | asi | tvam | viku | mānuīu | hotā ||



ब्रह्म मुनि जी Brahma Muni ji


१०।००१।०४

मन्त्रविषयः

 

 

अन्वयार्थः

(अतः-) अत एव (अन्नावृधं त्वा) अन्नवर्धकं बृहन्तमग्निं त्वां सूर्यम् (पितुभृतः-जनित्रीः-अन्नैः) ओषधयोऽन्नं धारयित्र्यःपितुः अन्ननाम” [निघं० २।७] जनयित्र्यश्च प्राणिनां प्रादुर्भावयित्र्यः पोषयित्र्योऽन्नैः, यान्यन्नानि धारयन्ति तैरेवेत्यर्थः (प्रतिचरन्ति) त्वां सूर्यं स्वस्मिन् धारयन्ति, हि त्वया विना ता अन्नं धारयितुं शक्ता प्राणिपोषणे समर्था भवन्ति (पुनः-ईम्) पुनः खलु (ताः-अन्यरूपाः प्रत्येषि) ताः शुष्का ओषधीः पार्थिवोऽग्निर्भूत्वा प्राप्तो भवसि (मानुषीषु विक्षु होता-असि) मानवीयप्रजासु तदर्थं भोजनपाकहोमाद्यभीष्टकार्यस्य सम्पादयिता भवसि ॥४॥

(अतः-) अतएव (अन्नावृधं त्वा) अन्नवर्धक तुझ सूर्य को (पितुभृतः-जनित्रीः-अन्नैः) अन्न को धारण करनेवाली और जीवन-पोषण देनेवाली ओषधियाँ (प्रतिचरन्ति) तुझ सूर्य को अपने अन्दर धारण करती हैं; तेरे बिना वे अन्न धारण नहीं कर सकतीं, प्राणियों को प्रादुभूर्त कर सकतीं तथा जीवन-पोषण दे सकती हैं (पुनः-ईम्) पश्चात् ही (ताः-अन्यरूपाः प्रत्येषि) उन अन्यरूप हुई-सुखी हुई ओषधियों को तू पार्थिव अग्नि होकर प्राप्त होता है (मानुषीषु विक्षु होता-भवसि) यतः मानव प्रजाओं के निमित्त उनके भोजन पाक होम आदि अभीष्ट कार्य का सम्पादन करनेवाला होता है-बनता है ॥४॥

भावार्थः

 

सूर्य ओषधियों में अन्न धारण करता है, प्राणियों के लिये उनमें जीवन-पोषण शक्ति देता है। पुनः पकी-सूखी हो जाने पर पार्थिव अग्नि के रूप में होकर उन्हें जला देता है, जो मनुष्यों के लिये भोजन होम आदि अभीष्ट कार्य का साधक बनता है। विद्यासूर्य विद्वान् अपने ज्ञानोपदेश से ओषधियों को फलने, रक्षण करने और प्राणियों को उनके सेवन से स्वस्थ रहने तथा दीर्घ जीवन तक पुष्टि प्राप्त करने के लिये समर्थ बनावें ॥४॥





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