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Mantra Rig 10.001.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 1 of Mandal 10 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 29 of Adhyaya 5 of Ashtak 7 of Rig Veda

Mantra 2 of Anuvaak 1 of Mandal 10 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- त्रितः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- विराट्त्रिस्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

जा॒तो गर्भो॑ असि॒ रोद॑स्यो॒रग्ने॒ चारु॒र्विभृ॑त॒ ओष॑धीषु चि॒त्रः शिशु॒: परि॒ तमां॑स्य॒क्तून्प्र मा॒तृभ्यो॒ अधि॒ कनि॑क्रदद्गाः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

जातो गर्भो असि रोदस्योरग्ने चारुर्विभृत ओषधीषु चित्रः शिशुः परि तमांस्यक्तून्प्र मातृभ्यो अधि कनिक्रदद्गाः

 

The Mantra's transliteration in English

sa jāto garbho asi rodasyor agne cārur vibhta oadhīu | citra śiśu pari tamāsy aktūn pra mātbhyo adhi kanikradad gā ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

सः जा॒तः गर्भः॑ अ॒सि॒ रोद॑स्योः अग्ने॑ चारुः॑ विऽभृ॑तः ओष॑धीषु चि॒त्रः शिशुः॑ परि॑ तमां॑सि अ॒क्तून् प्र मा॒तृऽभ्यः॑ अधि॑ कनि॑क्रदत् गाः॒

 

The Pada Paath - transliteration

sa | jāta | garbha | asi | rodasyo | agne | cāru | vi-bhta | oadhīu | citra | śiśu | pari | tamāsi | aktūn | pra | māt-bhya | adhi | kanikradat | gā||



ब्रह्म मुनि जी Brahma Muni ji


१०।००१।०२

मन्त्रविषयः

 

 

अन्वयार्थः

(रोदस्योः-गर्भः) द्यावापृथिव्योःरोदसी द्यावापृथिवीनाम” [निघ०-३।३०] गर्भभूतो गर्भ इव मध्ये वर्तमानो यद्वा तयोस्तत्रस्थपदार्थानां शब्दयिता वर्णयिता प्रकटयिता, “गर्भ गृभेर्गृणात्यर्थे” [निरु० १०।२३] (सः-जातः-असि) त्वं सूर्यः प्रसिद्धः सर्वैः साक्षाद् दृष्टिपथमागतो भवसि (ओषधीषु) ओषं तवौष्ण्यं धयन्तीषु पृथिवीषुजगत्य ओषधयः” [श० १।२।२।२] “इयं पृथिवी वै जगती” [श० १२।८।२।२०] तत्रस्थासु खल्वोषधिषु (विभृतः) विशेषेण धृतः सन् (चारुः) चरणीयः-भोजनपाकहोमकार्येषु सेवनीयःचारुः चरतेः” [निरु० ८।१४] (अग्ने) अग्निःव्यत्ययेन सम्बुद्धिःपार्थिवोऽग्निरुच्यते सूर्यः (चित्रः शिशुः) चायनीयो दशनीयः प्रशंसनीयश्चशिशुः शंसनीयो भवति” [निरु० १०।३९] (मातृभ्यः-अधिगाः प्रकनिक्रदत्) यदा पृथिवीषुनमो मात्रे पृथिव्यै” [जै० १।१२९] “इयं पृथिवी वै माता” [श० १३।१।६।१] रश्मीन्सर्वे रश्मयो गाव उच्यन्ते” [निरु० २।८] भृशं प्रगमयन् प्रेरयन्कनिक्रदत् गच्छन्” [यजु० ११।४३। दयानन्दः] (तमांसि-अक्तून् परि) अग्निरूपेणान्धकारान् पर्यस्यसि सूर्यरूपेण रात्रीः परिक्षिपसि ॥२॥

(रोदस्योः-गर्भः) द्युलोक और पृथिवीलोक का गर्भ-गर्भसमान मध्य में वर्त्तमान अथवा उनका तथा उनके ऊपर स्थित पदार्थों का वर्णन करनेवाला-प्रकट करनेवाला (सः-जातः-असि) वह तू सूर्य दृष्टिपथ में आया होता है (ओषधीषु) तेरे ओष-ताप को पीनेवाली पृथिवियों पर तथा उन पर स्थित ओषधियों में (विभृतः) विशेषरूप से प्रविष्ट हुआ (चारुः) चरणीय-भोजन पाक होम आदि कार्यों में सेवनीय (अग्ने) अग्नि नाम से पार्थिव अग्नि ! तू कहा जाता है (चित्रः शिशुः) दर्शनीय तथा प्रशंसनीय है (मातृभ्यः-अधि) जब पृथिवियों पर (गाः प्रकनिक्रदत्) अपनी किरणों-ज्वालाओं को प्रेरित करता हुआ (तमांसि-अक्तून् परि) अग्निरूप से अन्धकारों को परे भगाता है और सूर्यरूप से रात्रियों को परे हटाता है ॥२॥

भावार्थः

 

पृथिवलोक और द्युलोक का गर्भ-गर्भसमान मध्य में रहनेवाला तथा उनका और उन पर स्थित पदार्थों को दर्शाने-बतानेवाला सूर्य है। पृथिवी पर से अग्निरूप से अन्धकारों को दूर भगाता है, सूर्यरूप से रात्रियों को परे हटाता है। ऐसे हे विद्यासूर्य विद्वान् ! मानवसमाज एवं प्रत्येक गृह में प्रवचन कर अज्ञानान्धाकर-अविद्यारात्रि को भगाकर सावधान करें ॥२॥





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