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Mantra Rig 01.189.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 189 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 10 of Adhyaya 5 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 86 of Anuvaak 24 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- स्वराट्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अग्ने॒ त्वम॒स्मद्यु॑यो॒ध्यमी॑वा॒ अन॑ग्नित्रा अ॒भ्यम॑न्त कृ॒ष्टीः पुन॑र॒स्मभ्यं॑ सुवि॒ताय॑ देव॒ क्षां विश्वे॑भिर॒मृते॑भिर्यजत्र

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अग्ने त्वमस्मद्युयोध्यमीवा अनग्नित्रा अभ्यमन्त कृष्टीः पुनरस्मभ्यं सुविताय देव क्षां विश्वेभिरमृतेभिर्यजत्र

 

The Mantra's transliteration in English

agne tvam asmad yuyodhy amīvā anagnitrā abhy amanta kṛṣṭī | punar asmabhya suvitāya deva kā viśvebhir amtebhir yajatra 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अग्ने॑ त्वम् अ॒स्मत् यु॒यो॒धि॒ अमी॑वाः अन॑ग्निऽत्राः अ॒भि अम॑न्त कृ॒ष्टीः पुनः॑ अ॒स्मभ्य॑म् सु॒वि॒ताय॑ दे॒व॒ क्षाम् विश्वे॑भिः अ॒मृते॑भिः य॒ज॒त्र॒

 

The Pada Paath - transliteration

agne | tvam | asmat | yuyodhi | amīvā | anagni-trā | abhi | amanta | kṛṣṭī | puna | asmabhyam | suvitāya | deva | kām | viśvebhi | amtebhi | yajatra 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१८९।०३

मन्त्रविषयः-

अथेश्वरदृष्टान्तेन विद्वद्गुणानाह।

अब ईश्वर के दृष्टान्त से विद्वानों के गुणों को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(अग्ने) ईश्वर इव विद्वन् (त्वम्) (अस्मत्) (युयोधि) पृथक् कुरु (अमीवाः) रोगाः (अनग्नित्राः) अविद्यमानज्वरेण रक्षकाः (अभ्यमन्त) अभितो रुजन्ति (कृष्टीः) मनुष्यान् (पुनः) (अस्मभ्यम्) (सुविताय) ऐश्वर्यप्राप्तये (देव) कामयमान (क्षाम्) भूमि भूमिराज्यमात्रं वा (विश्वेभिः) सर्वैः (अमृतेभिः) अमृतात्मकैरोषधैः (यजत्र) सङ्गच्छमान ॥३॥

हे (यजत्र) सङ्ग करते हुए (देव) कामना करनेवाले (अग्ने) ईश्वर के समान विद्वान् वैद्य जन ! (त्वम्) आप जो (अनग्नित्राः) ऐसे हैं कि यदि उनके साथ ज्वर न विद्यमान हो तो अविद्यमान ज्वर से शरीर की रक्षा करनेवाले हैं, वे (अमीवाः) रोग (कृष्टीः) मनुष्यों को (अभ्यमन्त) सब ओर से रुग्ण करते कष्ट देते हैं उनको (अस्मत्) हम लोगों से (युयोधि) अलग कर (पुनः) फिर (विश्वेभिः) समस्त (अमृतेभिः) अमृतरूप ओषधियों से (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (सुविताय) ऐश्वर्य प्राप्त होने के लिये (क्षाम्) भूमि के राज्य को प्राप्त कीजिये ॥३॥

 

अन्वयः-

हे यजत्र देवाग्रे वैद्यस्त्वं येऽनग्नित्रा अमीवा रोगाः कृष्टीरभ्यमन्त तानस्मद्युयोधि पुनर्विश्वेभिरमृतेभिरस्मभ्यं सुविताय क्षां भूराज्य प्राप्रय ॥३॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथेश्वरो वेदद्वारा विद्यारोगाज्जनान् पृथक् करोति तथा सद्वैद्या मनुष्यान् रोगेभ्यो निवर्त्त्य अमृतात्मकैरौषधैर्वर्द्धयित्वैश्वर्यं प्रापयन्ति ॥३॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ईश्वर वेदद्वारा अविद्यारूपी रोग से मनुष्यों को अलग करता है वैसे अच्छे वैद्य मनुष्यों को रोगों से निवृत्त कर अमृतरूपी ओषधियों से बढ़ाकर ऐश्वर्य की प्राप्ति कराते हैं ॥३॥

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