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Mantra Rig 01.189.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 189 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 10 of Adhyaya 5 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 84 of Anuvaak 24 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑ रा॒ये अ॒स्मान्विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान् यु॒यो॒ध्य१॒॑स्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठां ते॒ नम॑उक्तिं विधेम

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम

 

The Mantra's transliteration in English

agne naya supathā rāye asmān viśvāni deva vayunāni vidvān | yuyodhy asmaj juhurāam eno bhūyiṣṭ te namaükti vidhema 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अग्ने॑ नय॑ सु॒ऽपथा॑ रा॒ये अ॒स्मान् विश्वा॑नि दे॒व॒ व॒युना॑नि वि॒द्वान् यु॒यो॒धि अ॒स्मत् जु॒हु॒रा॒णम् एनः॑ भूयि॑ष्ठाम् ते॒ नमः॑ऽउक्तिम् वि॒धे॒म॒

 

The Pada Paath - transliteration

agne | naya | su-pathā | rāye | asmān | viśvāni | deva | vayunāni | vidvān | yuyodhi | asmat | juhurāam | ena | bhūyiṣṭhām | te | nama-uktim | vidhema 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१८९।०१

मन्त्रविषयः-

अथेश्वरगुणानाह।

अब एकसौ नवासी सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में ईश्वर के गुणों का उपदेश करते हैं।

 

पदार्थः-

(अग्ने) स्वप्रकाशस्वरूपेश्वर (नय) प्रापय (सुपथा) धर्म्येण सुगमेन सरलेन मार्गेण (राये) ऐश्वर्यानन्दप्राप्तये (अस्मान्) मुमुक्षून् (विश्वानि) सर्वाणि चराचरजगत्कर्माणि च (देव) कमनीयानन्दप्रद (वयुनानि) प्रज्ञानानि (विद्वान्) यो वेत्ति (युयोधि) वियोजय (अस्मत्) (जुहुराणम्) कुटिलगतिजन्यम् (एनः) पापम् (भूयिष्ठाम्) अधिकाम् (ते) तव (नमउक्तिम्) नमसा सत्कारेण सह स्तुतिम् (विधेम) कुर्याम ॥१॥

हे (देव) मनोहर आनन्द के देनेवाले (अग्ने) स्वप्रकाशस्वरूपेश्वर (विद्वान्) सकल शास्त्रवेत्ता ! आप (अस्मान्) हम मुमुक्षु अर्थात् मोक्ष चाहते हुए जनों को (राये) धनादि प्राप्ति के लिये (सुपथा) धर्मयुक्त सरल मार्ग से (विश्वानि) समस्त (वयुनानि) उत्तम-उत्तम ज्ञानों को (नय) प्राप्त कराइये, (जुहुराणम्) खोटी चाल से उत्पन्न हुए (एनः) पाप को (अस्मत्) हमसे (युयोधि) अलग करिये जिसमें हम (ते) आपकी (भूयिष्ठाम्) अधिकतर (नमउक्तिम्) सत्कार के साथ स्तुति का (विधेम) विधान करें ॥१॥

 

अन्वयः-

हे देवाऽग्ने विद्वाँस्त्वमस्मात्राये सुपथा विश्वानि वयुनानि नय। जुहुराणमेनोऽस्मद्युयोधि यतो वयं ते भूयिष्ठां नमउक्तिं विधेम ॥१॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैर्धर्मविज्ञानमार्गप्राप्तये अधर्मनिवृत्तये च परमेश्वरः सम्प्रार्थनीयः सदा सुमार्गेण गन्तव्यं दुष्पथादधर्ममार्गात्पृथक् स्थातव्यं यथा विद्वांसः परमेश्वरे परानुरक्तिं कुर्वन्ति तथेतरैश्च कार्या ॥१॥

मनुष्यों को धर्म तथा विज्ञान मार्ग की प्राप्ति और अधर्म की, निवृत्ति के लिये परमेश्वर की अच्छे प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये और सदा सुमार्ग से चलना चाहिये, दुःखरूपी अधर्म मार्ग से अलग रहना चाहिये, जैसे विद्वान् लोग परमेश्वर में उत्तम अनुराग करते वैसे अन्य लोगों को भी करना चाहिये ॥१॥


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