Rig Veda‎ > ‎Mandal 01‎ > ‎Sukta 187‎ > ‎

Mantra Rig 01.187.009

MANTRA NUMBER:

Mantra 9 of Sukta 187 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 7 of Adhyaya 5 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 70 of Anuvaak 24 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः

देवता (Devataa) :- ओषधयः

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यत्ते॑ सोम॒ गवा॑शिरो॒ यवा॑शिरो॒ भजा॑महे वाता॑पे॒ पीव॒ इद्भ॑व

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यत्ते सोम गवाशिरो यवाशिरो भजामहे वातापे पीव इद्भव

 

The Mantra's transliteration in English

yat te soma gavāśiro yavāśiro bhajāmahe | vātāpe pīva id bhava 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यत् ते॒ सो॒म॒ गोऽआ॑शिरः यव॑ऽआशिरः भजा॑महे वाता॑पे पीवः॑ इत् भ॒व॒

 

The Pada Paath - transliteration

yat | te | soma | go--āśira | yava-āśira | bhajāmahe | vātāpe | pīva | it | bhava 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१८७।०९

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(यत्) (ते) तस्य (सोम) यवाद्योषधिरसव्यापिन् ईश्वर (गवाशिरः) गोरससंस्कर्त्ता च (यवाशिरः) यवाद्योषधिसंयोगेन संस्कृतस्य (भजामहे) सेवामहे (वातापे) वातवत्सर्वव्यापिन् (पीबः) प्रवृद्धिकरः (इत्) एव (भव) ॥९॥

हे (सोम) यवादि ओषधि रसव्यापी ईश्वर ! (गवाशिरः) गौ के रस से बनाये वा (यवाशिरः) यवादि ओषधियों के संयोग से बनाये हुए (ते) उस अन्न के (यत्) जिस सेवनीय अंश को हम लोग (भजामहे) सेवते हैं उससे, हे (वातापे) पवन के समान सब पदार्थों में व्यापक परमेश्वर ! (पीबः) उत्तम वृद्धि करनेवाले (इत्) ही (भव) हूजिये ॥९॥

 

अन्वयः-

हे सोम गवाशिरो यवाशिरस्ते यत्सेव्यमंशं वयं भजामहे। तस्मात् हे वातापे पीव इद्भव ॥९॥

 

 

भावार्थः-

यथा जना अन्नादिपदार्थेषु तत्तत्पाकक्रियानुकूलान् सर्वान् संस्कारान कुर्वन्ति तथा रसानपि रसोचितसंस्कारैः संपादयन्तु ॥९॥

जैसे मनुष्य अन्नादि पदार्थों में उन उन की पाकक्रिया के अनुकूल सब संस्कारों को करते हैं वैसे रसों को भी रसोचित संस्कारों से सिद्ध करें ॥९॥

Comments