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Mantra Rig 01.187.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 187 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 6 of Adhyaya 5 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 66 of Anuvaak 24 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः

देवता (Devataa) :- ओषधयः

छन्द: (Chhand) :- निचृदनुष्टुप्

स्वर: (Swar) :- गान्धारः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

तव॒ त्ये पि॑तो॒ दद॑त॒स्तव॑ स्वादिष्ठ॒ ते पि॑तो प्र स्वा॒द्मानो॒ रसा॑नां तुवि॒ग्रीवा॑ इवेरते

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

तव त्ये पितो ददतस्तव स्वादिष्ठ ते पितो प्र स्वाद्मानो रसानां तुविग्रीवा इवेरते

 

The Mantra's transliteration in English

tava tye pito dadatas tava svādiṣṭha te pito | pra svādmāno rasānā tuvigrīvā iverate 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

तव॑ त्ये पि॒तो॒ इति॑ दद॑तः तव॑ स्वा॒दि॒ष्ठ॒ ते पि॒तो॒ इति॑ प्र स्वा॒द्मानः॑ रसा॑नाम् तु॒वि॒ग्रीवाः॑ऽइव ई॒र॒ते॒

 

The Pada Paath - transliteration

tava | tye | pito iti | dadata | tava | svādiṣṭha | te | pito iti | pra | svādmānarasānām | tuvigrīvā-iva | īrate 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१८७।०५

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(तव) (त्ये) ते (पितो) अन्नव्यापिन् पालकेश्वर (ददतः) (तव) (स्वादिष्ठ) अतिशयेन स्वादितः (ते) तस्य (पितो) (प्र) (स्वाद्मानः) स्वादिष्ठाः (रसानाम्) मधुरादीनाम् (तुविग्रीवाइव) तुवि बलिष्ठा ग्रीवा येषान्ते (ईरते) प्राप्नुयुः ॥५॥

हे (पितो) अन्नव्यापी पालक परमात्मन् ! (ददतः) देते हुए (तव) आपके जो अन्न वा (त्ये) वे पूर्वोक्त रस हैं। हे (स्वादिष्ठ) अतीव स्वादुयुक्त (पितो) पालक अन्नव्यापक परमात्मन् (तव) आपके उस अन्न के सहित (ते) वे रस (रसानाम्) मधुरादि रसों के बीच (स्वाद्मानः) अतीवस्वादु (तुविग्रीवाइव) जिनका प्रबल गला उन जीवों के समान (प्रेरते) प्रेरणा देते अर्थात् जीवों को प्रीति उत्पन्न कराते हैं ॥५॥ [*स्वादु (मीठा), अम्ल, लावण, कटु (चरपरा), तिक्त (कड़वा), और कषाय (कसैला) ॥सं०॥]

 

अन्वयः-

हे पितो ददतस्तव त्ये पृर्वोक्ता रसाः सन्ति। हे स्वादिष्ठ पितो तव ते रसा रसानां मध्ये स्वाद्मानस्तुविग्रीवाइव प्रेरते जीवानां प्रीतिं जनयन्ति ॥५॥

 

 

भावार्थः-

सर्वपदार्थव्यापकः परमात्मैव सर्वेभ्योऽन्नादिपदार्थान् प्रयच्छत तत्कृता एव पदार्थाः स्वगुणानुकूलाः केचित् स्वादिष्ठाः केचिच्च स्वादुतरास्सन्तीति सर्वैर्वेदितव्यम् ॥५॥

सब पदार्थों में व्याप्त परमात्मा ही सभों के लिये अन्नादि पदार्थों को अच्छे प्रकार देता है और उसके किये हुए ही पदार्थ अपने गुणों के अनुकूल कोई अतीव स्वादु और कोई अतीव स्वादुतर हैं यह सबको जानना चाहिये ॥५॥

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