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Mantra Rig 01.187.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 187 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 6 of Adhyaya 5 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 65 of Anuvaak 24 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः

देवता (Devataa) :- ओषधयः

छन्द: (Chhand) :- विराड्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

तव॒ त्ये पि॑तो॒ रसा॒ रजां॒स्यनु॒ विष्ठि॑ताः दि॒वि वाता॑ इव श्रि॒ताः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

तव त्ये पितो रसा रजांस्यनु विष्ठिताः दिवि वाता इव श्रिताः

 

The Mantra's transliteration in English

tava tye pito rasā rajāsy anu viṣṭhitā | divi vātā iva śritā 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

तव॑ त्ये पि॒तो॒ इति॑ रसाः॑ रजां॑सि अनु॑ विऽस्थि॑ताः दि॒वि वाताः॑ऽइव शृइ॒ताः

 

The Pada Paath - transliteration

tava | tye | pito iti | rasā | rajāsi | anu | vi-sthitā | divi | vātā-iva | śitāḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१८७।०४

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(तव) तस्य (त्ये) ते (पितो) अन्नव्यापिन् परमात्मन् (रसाः) स्वाद्वन्नादि षड्विधाः (रजांसि) लोकान् (अनु) (विष्ठिताः) विशेषेण स्थिताः (दिवि) अन्तरिक्षे (वाताइव) (श्रिताः) आश्रिताः सेवमानाः ॥४॥

हे (पितो) अन्नव्यापिन् परमात्मन् ! (तव) उस अन्न के बीच जो (रसाः) स्वादु खट्टा मीठा तीखा चरपरा आदि छः प्रकार के (*) रस (दिवि) अन्तरिक्ष में (वाताइव) पवनों के समान (श्रिताः) आश्रय को प्राप्त हो रहे हैं (त्ये) वे (रजांसि) लोकलोकान्तरों को (अनु, विष्ठिताः) पीछे प्रविष्ट होते हैं ॥४॥

 

अन्वयः-

हे पितो तव तस्यान्नस्य मध्ये ये रसा दिवि वाताइव श्रितास्त्ये रजांस्यनु विष्ठिता भवन्ति ॥४॥

 

 

भावार्थः-

अस्मिन् संसारे परमात्मव्यवस्थया लोकलोकान्तरे भूमिजलपवनानुकूला रसादयो भवन्ति नहि सर्वे सार्वत्रिका इति भावः ॥४॥

इस संसार में परमात्मा की व्यवस्था से लोकलोकान्तरों में भूमि, जल और पवन के अनुकूल रसादि पदार्थ होते हैं किन्तु सब पदार्थ सब जगह प्राप्त नहीं हो सकते ॥४॥

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