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Mantra Rig 01.187.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 187 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 6 of Adhyaya 5 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 63 of Anuvaak 24 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः

देवता (Devataa) :- ओषधयः

छन्द: (Chhand) :- निचृद्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

स्वादो॑ पितो॒ मधो॑ पितो व॒यं त्वा॑ ववृमहे अ॒स्माक॑मवि॒ता भ॑व

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

स्वादो पितो मधो पितो वयं त्वा ववृमहे अस्माकमविता भव

 

The Mantra's transliteration in English

svādo pito madho pito vaya tvā vavmahe | asmākam avitā bhava 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

स्वादो॒ इति॑ पितो॒ इति॑ मधो॒ इति॑ पि॒तो॒ इति॑ व॒यम् त्वा॒ व॒वृ॒म॒हे॒ अ॒स्माक॑म् अ॒वि॒ता भ॒व॒

 

The Pada Paath - transliteration

svādo iti | pito iti | madho iti | pito iti | vayam | tvā | vavmahe | asmākam | avitā | bhava 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१८७।०२

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(स्वादो) स्वादु (पितो) पेयम् (मधो) मधुरम् (पितो) पालकमन्नम् (वयम्) (त्वा) तत्। अत्र व्यत्ययः। (ववृमहे) स्वीकुर्महे (अस्माकम्) (अविता) रक्षकः (भव) ॥२॥

हे परमात्मन् ! आपके रचे (स्वादो) स्वादु (पितो) पीने योग्य जल तथा (मधो) मधुर (पितो) पालना करनेवाले (त्वा) उस अन्न को (वयम्) हम लोग (ववृमहे) स्वीकार करते हैं इससे आप उस अन्नपान के दान से (अस्माकम्) हमारी (अविता) रक्षा करनेवाले (भव) हूजिये ॥२॥

 

अन्वयः-

हे परमात्मन् त्वन्निर्मितं स्वादो पितो मधो पितो त्वा वयं ववृमहे। अतस्त्वं तदन्नपानदानेनास्माकमविता भव ॥२॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैर्मधुरादिरसयोगेन स्वादिष्ठमन्नं व्यञ्जनं चायुर्वेदरीत्या निर्माय सदा भोक्तव्यम्। यद्रोगनाशकत्वेनायुर्वर्द्धनाद्रक्षकं भवेत् ॥२॥

मनुष्यों को मधुरादि रस के योग से स्वादिष्ठ अन्न और व्यञ्जन को आयुर्वेद की रीति से बनाकर सदा भोजन करना चाहिये, जो रोग को नष्ट करने से आयुर्दा बढ़ाने से रक्षा करनेवाला हो ॥२॥


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