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Mantra Rig 01.187.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 187 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 6 of Adhyaya 5 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 62 of Anuvaak 24 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः

देवता (Devataa) :- ओषधयः

छन्द: (Chhand) :- उष्णिक्

स्वर: (Swar) :- ऋषभः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

पि॒तुं नु स्तो॑षं म॒हो ध॒र्माणं॒ तवि॑षीम् यस्य॑ त्रि॒तो व्योज॑सा वृ॒त्रं विप॑र्वम॒र्दय॑त्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

पितुं नु स्तोषं महो धर्माणं तविषीम् यस्य त्रितो व्योजसा वृत्रं विपर्वमर्दयत्

 

The Mantra's transliteration in English

pitu nu stoam maho dharmāa taviīm | yasya trito vy ojasā vtra viparvam ardayat 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

पि॒तुम् नु स्तो॒ष॒म् म॒हः ध॒र्माण॑म् तवि॑षीम् यस्य॑ त्रि॒तः वि ओज॑सा वृ॒त्रम् विऽप॑र्वम् अ॒र्दय॑त्

 

The Pada Paath - transliteration

pitum | nu | stoam | maha | dharmāam | taviīm | yasya | trita | vi | ojasā | vtram | vi-parvam | ardayat 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१८७।०१

मन्त्रविषयः-

अथान्नगुणानाह।

अब ग्यारह ऋचावाले एकसौ सतासी सूक्त का आरम्भ है। उसके आरम्भ से अन्न के गुणों को कहते हैं।

 

पदार्थः-

(पितुम्) अन्नम् (नु) सद्यः (स्तोषम्) प्रशंसेयम् (महः) महत् (धर्माणम्) धर्मकारिणम् (तविषीम्) बलम् (यस्य) (त्रितः) मनोवाक्कर्मभ्यः (वि) विविधेऽर्थे (ओजसा) पराक्रमेण (वृत्रम्) वरणीयं धनम् (विपर्वम्) विवधैरङ्गोपाङ्गैः पूर्णम् (अर्दयत्) अर्दयेत् प्रापयेत् ॥१॥

(यस्य) जिसका (त्रितः) मन, वचन, कर्म से (वि, ओजसा) विविध प्रकार के पराक्रम से (विपर्वम्) विविध प्रकार के अङ्ग और उपाङ्गों से पूर्ण (वृत्रम्) स्वीकार करने योग्य धन को (अर्दयत्) प्राप्त करे उसके लिये (नु) शीघ्र (पितुम्) अन्न (महः) बहुत (धर्माणम्) धर्म करनेवाले और (तविषीम्) बल की मैं (स्तोषम्) प्रशंसा करूं ॥१॥

 

अन्वयः-

यस्य त्रितो व्योजसा विपर्वं वृत्रमर्दयत्तस्मै नु पितुं महो धर्माणं तविषीं चाहं स्तोषम् ॥१॥

 

 

भावार्थः-

ये बह्वन्नं गृहीत्वा सुसंस्कृत्यैतद्गुणान् विदित्वा यथायोग्यं द्रव्यान्तरेण संयोज्य भुञ्जते ते धर्माचरणाः सन्तः शरीरात्मबलं प्राप्य पुरुषार्थेन श्रियमुन्नेतु शक्नुवन्ति ॥१॥

जो बहुत अन्न को ले अच्छा संस्कार कर और उसके गुणों को जान यथायोग्य और व्यञ्जनादि पदार्थों के साथ मिलाके खाते हैं वे धर्म के आचरण करनेवाले होते हुए शरीर और आत्मा के बल को प्राप्त होकर पुरुषार्थ से लक्ष्मी की उन्नति कर सकते हैं ॥१॥


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