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Mantra Rig 01.185.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 185 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 2 of Adhyaya 5 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 44 of Anuvaak 24 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः

देवता (Devataa) :- द्यावापृथिव्यौ

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

सं॒गच्छ॑माने युव॒ती सम॑न्ते॒ स्वसा॑रा जा॒मी पि॒त्रोरु॒पस्थे॑ अ॒भि॒जिघ्र॑न्ती॒ भुव॑नस्य॒ नाभिं॒ द्यावा॒ रक्ष॑तं पृथिवी नो॒ अभ्वा॑त्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

संगच्छमाने युवती समन्ते स्वसारा जामी पित्रोरुपस्थे अभिजिघ्रन्ती भुवनस्य नाभिं द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्

 

The Mantra's transliteration in English

sagacchamāne yuvatī samante svasārā jāmī pitror upasthe | abhijighrantī bhuvanasya nābhi dyāvā rakatam pthivī no abhvāt 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

स॒ङ्गच्छ॑माने॒ इति॑ स॒म्ऽगच्छ॑माने यु॒व॒ती इति॑ सम॑न्ते॒ इति॒ सम्ऽअ॑न्ते स्वसा॑रा जा॒मी इति॑ पि॒त्रोः उ॒पऽस्थे॑ अ॒भि॒जिघ्र॑न्ती॒ इत्य॑भि॒ऽजिघ्र॑न्ती भुव॑नस्य नाभि॑म् द्यावा॑ रक्ष॑तम् पृ॒थि॒वी॒ इति॑ नः॒ अभ्वा॑त्

 

The Pada Paath - transliteration

sagacchamāneitisam-gacchamāne | yuvatī | iti | samanteitisam-ante | svasārā | jāmī iti | pitro | upa-sthe | abhijighrantī ity abhi-jighrantī | bhuvanasya | nābhim | dyāvā | rakatam | pthivī iti | na | abhvāt 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१८५।०५

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(संगच्छमाने) सहगामिन्यौ (युवती) युवाऽवस्थास्थे स्त्रियाविव (समन्ते) सम्यगन्तो ययोस्ते (स्वसारा) भगिन्यौ (जामी) कन्ये इव (पित्रोः) (उपस्थे) अङ्के (अभिजिघ्रन्ती) (भुवनस्य) लोकजातस्य (नाभिम्) नहनं मध्यस्थमाकर्षणाख्यं बन्धनम् (द्यावा) (रक्षतम्) (पृथिवी) (नः) (अभ्वात्) ॥५॥

(पित्रोः) माता-पिता की (उपस्थे) गोद में (संगच्छमाने) मिलाती हुई (जामी) दो कन्याओं के समान वा (युवती) तरुण दो स्त्रियों के समान वा (समन्ते) पूर्ण सिद्धान्त जिनका उन दो (स्वसारा) बहिनियों के समान (भुवनस्य) संसार के (नाभिम्) मध्यस्थ आकर्षण को (अभि, जिघ्रन्ती) गन्ध को समान स्वीकार करती हुई (द्यावा, पृथिवी) आकाश और पृथिवी के समान माता-पिताओ ! तुम (नः) हम लोगों की (अभ्वात्) अपराध से (रक्षतम्) रक्षा करो ॥५॥

 

अन्वयः-

पित्रोरुपस्थे संगच्छमाने जामी युवती समन्ते स्वसारेव भुवनस्य नाभिमभिजिघ्रन्ती द्यावापृथिवी इव हे मातापितरौ युवां नोऽस्मानभ्वाद्रक्षतम् ॥५॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्या ! यथा ब्रह्मचर्य्येण कृतविद्यौ यौवनस्थौ सञ्जातप्रीति कन्यावरौ सुखिनौ स्यातां तथा द्यावापृथिव्यौ जगद्धिताय वर्त्तेते ॥५॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे ब्रह्मचर्य से विद्या सिद्धि किये हुए तरुण जिनको परस्पर पूर्ण प्रीति है वे कन्या-वर सुखी हों वैसे द्यावापृथिवी जगत् के हित के लिये वर्त्तमान हैं ॥५॥


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