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Mantra Rig 01.181.008

MANTRA NUMBER:

Mantra 8 of Sukta 181 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 26 of Adhyaya 4 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 18 of Anuvaak 24 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः

देवता (Devataa) :- अश्विनौ

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

उ॒त स्या वां॒ रुश॑तो॒ वप्स॑सो॒ गीस्त्रि॑ब॒र्हिषि॒ सद॑सि पिन्वते॒ नॄन् वृषा॑ वां मे॒घो वृ॑षणा पीपाय॒ गोर्न सेके॒ मनु॑षो दश॒स्यन्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

उत स्या वां रुशतो वप्ससो गीस्त्रिबर्हिषि सदसि पिन्वते नॄन् वृषा वां मेघो वृषणा पीपाय गोर्न सेके मनुषो दशस्यन्

 

The Mantra's transliteration in English

uta syā vā ruśato vapsaso gīs tribarhii sadasi pinvate nn | vṛṣā vām megho vṛṣaā pīpāya gor na seke manuo daśasyan 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

उ॒त स्या वा॒म् रुश॑तः वप्स॑सः गीः त्रि॒ऽब॒र्हिषि॑ सद॑सि पि॒न्व॒ते॒ नॄन् वृषा॑ वा॒म् मे॒घः वृ॒ष॒णा॒ पी॒पा॒य॒ गोः सेके॑ मनु॑षः द॒श॒स्यन्

 

The Pada Paath - transliteration

uta | syā | vām | ruśata | vapsasa | gī | tri-barhii | sadasi | pinvate | nn | vṛṣā | vām | megha | vṛṣaā | pīpāya | go | na | seke | manua | daśasyan 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१८१।०८

मन्त्रविषयः-

पुनरध्यापकोपदेशकविषयमाह।

फिर अध्यापकोपदेशक विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(उत) अपि (स्या) सा (वाम्) युवयोः (रुशतः) प्रकाशितस्य (वप्ससः) सुरूपस्य (गीः) वाक् (त्रिबर्हिषि) त्रयो वेदवेत्तारो वृद्धा यस्यां तस्याम् (सदसि) सभायाम् (पिन्वते) सेवते (नॄन्) नायकान् मनुष्यान् (वृषा) (वाम्) युवयोः (मेघः) मेघ इव (वृषणा) दुष्टसामर्थ्यबन्धकौ (पीपाय) आप्याययति वर्द्धयति (गोः) पृथिव्याः (न) इव (सेके) सिञ्चने (मनुषः) मनुष्यान् (दशस्यन्) अभिमतं प्रयच्छन् ॥

हे (वृषणा) दुष्टों की सामर्थ्य बांधनेवाले अध्यापकोपदेशको ! (वाम्) तुम दोनों के (रुशतः) प्रकाशित (वप्ससः) रूप की जो (गीः) वाणी है (स्या) वह (त्रिबर्हिषि) तीन वेदवेत्ता वृद्ध जिसमें हैं उस (सदसि) सभा में (नॄन्) अग्रगन्ता मनुष्यों को (पिन्वते) सेवती है और (वाम्) तुम दोनों का जो (वृषा) सेचने में समर्थ (मेघः) मेघ के समान वाणी विषय (दशस्यन्) चाहे हुए फल को देता हुआ (गोः) पृथिवी के (सेके) सेचन में (न) जैसे वैसे अपने व्यवहार में (मनुषः) मनुष्यों की (पीपाय) उन्नति कराता है उसको (उत) भी हम सेवें ॥

 

अन्वयः-

हे वृषणा वां रुशतो वप्ससो या गीः स्या त्रिबर्हिषि सदसि नॄन् पिन्वते तां वां वृषा मेघो दशस्यन् गोः सेके न च व्यवहारे मनुषः पीपाय तमुत वयं सेवेमहि ॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। मनुष्या यदा सत्यं वदन्ति तदा मुखाऽऽकृतिर्मलीनी न भवति यदा मिथ्या वदन्ति तदा मुखं मलीनं जायते। यथा पृथिव्यामौषधानां वर्द्धको मेघस्तथा ये सभासद उपदेश्यांश्च सत्यभाषणेन वर्द्धयन्ति ते सर्वेषां हितैषिणो भवन्ति ॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार हैं। मनुष्य जब सत्य कहते हैं तब उनके मुख की आकृति मलीन नहीं होती और जब झूठ कहते हैं तब उनका मुख मलीन हो जाता है। जैसे पृथिवी पर ओषधियों का बढ़ानेवाला मेघ है वैसे जो सभासद् उपदेश करने योग्यों को सत्य भाषण से बढ़ाते हैं वे सबके हितैषी होते हैं ॥


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