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Mantra Rig 01.181.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 181 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 25 of Adhyaya 4 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 13 of Anuvaak 24 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः

देवता (Devataa) :- अश्विनौ

छन्द: (Chhand) :- विराट्त्रिस्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

वां॒ रथो॒ऽवनि॒र्न प्र॒वत्वा॑न्त्सृ॒प्रव॑न्धुरः सुवि॒ताय॑ गम्याः वृष्ण॑: स्थातारा॒ मन॑सो॒ जवी॑यानहम्पू॒र्वो य॑ज॒तो धि॑ष्ण्या॒ यः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

वां रथोऽवनिर्न प्रवत्वान्त्सृप्रवन्धुरः सुविताय गम्याः वृष्णः स्थातारा मनसो जवीयानहम्पूर्वो यजतो धिष्ण्या यः

 

The Mantra's transliteration in English

ā vā ratho 'vanir na pravatvān spravandhura suvitāya gamyā | vṛṣṇa sthātārā manaso javīyān ahampūrvo yajato dhiṣṇyā ya 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

वा॒म् रथः॑ अ॒वनिः॑ प्र॒वत्वा॑न् सृ॒प्रऽव॑न्धुरः सु॒वि॒ताय॑ ग॒म्याः॒ वृष्णः॑ स्था॒ता॒रा॒ मन॑सः जवी॑यान् अ॒ह॒म्ऽपू॒र्वः य॒ज॒तः धि॒ष्ण्या॒ यः

 

The Pada Paath - transliteration

ā | vām | ratha | avani | na | pravatvān | spra-vandhura | suvitāya | gamyā | vṛṣṇa | sthātārā | manasa | javīyān | aham-pūrva | yajata | dhiṣṇyā | yaḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१८१।०३

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(आ) समन्तात् (वाम्) युवयोः (रथः) यानम् (अवनिः) पृथिवी (न) इव (प्रवत्वान्) प्रशस्ता प्रवतो वेगादयो गुणा विद्यन्ते यस्मिन् (सृप्रवन्धुरः) सृप्रैः सङ्गतैर्वन्धुरैर्वन्धनैर्युक्तः (सुविताय) ऐश्वर्याय (गम्याः) गमयितुं योग्याः (वृष्णाः) बलवतः (स्थातारा) स्थातारो (मनसः) (जवीयान्) अतिशयेन वेगवान् (अहंपूर्वः) अयमहमित्यात्मज्ञानेन पूर्णः (यजतः) सङ्गतः (धिष्ण्या) धिष्णौ प्रगल्भौ (यः) ॥३॥

हे (स्थातारा) स्थि होनेवाले (धिष्ण्या) धृष्टप्रगल्भ अध्यापक और उपदेशको ! (यः) जो (वाम्) तुम्हारा (अवनिः) पृथिवी के (न) समान (प्रवत्वाम्) जिसमें प्रशस्त वेगादि गुण विद्यमान (सृप्रवन्धुरः) जो मिले हुए बन्धनों से युक्त (मनसः) मन से भी (जवीयान्) अत्यन्त वेगवान् (अहंपूर्वः) यह मैं हूं इस प्रकार आत्मज्ञान से पूर्ण (यजतः) मिला हुआ (रथः) रथ (सुविताय) ऐश्वर्य्य के लिये होता है जिसमें (वृष्णः) बलवान् (आ, गम्याः) चलाने को योग्य अग्न्यादि पदार्थ अच्छे प्रकार जोड़े जाते हैं उसको मैं सिद्ध करूं ॥३॥

 

अन्वयः-

हे स्थातारा धिष्ण्या यो वामवनिर्न प्रवत्वान् सृप्रवन्धुरो मनसो जवीयान् अहंपूर्वो यजतो रथः सुविताय भवति यत्र वृष्ण आगम्याः प्रयुज्यन्ते तमहं साध्नुयाम ॥३॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैरैश्वर्य्योन्नतये पृथिवीवन्मनोवेगद्वेगवन्ति यानानि निर्मीयन्ते तेत्र दृढा स्थिरसुखा जायन्ते ॥३॥

मनुष्यों से जो ऐश्वर्य्य की उन्नति के लिये पृथिवी के तुल्य वा मन के वेग तुल्य वेगवान् यान बनाये जाते हैं वे यहां स्थिर सुख देनेवाले होते हैं ॥३॥


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