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Mantra Rig 01.174.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 174 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 17 of Adhyaya 4 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 92 of Anuvaak 23 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- भुरिक्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

ज॒घ॒न्वाँ इ॑न्द्र मि॒त्रेरू॑ञ्चो॒दप्र॑वृद्धो हरिवो॒ अदा॑शून् प्र ये पश्य॑न्नर्य॒मणं॒ सचा॒योस्त्वया॑ शू॒र्ता वह॑माना॒ अप॑त्यम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

जघन्वाँ इन्द्र मित्रेरूञ्चोदप्रवृद्धो हरिवो अदाशून् प्र ये पश्यन्नर्यमणं सचायोस्त्वया शूर्ता वहमाना अपत्यम्

 

The Mantra's transliteration in English

jaghanvām̐ indra mitrerūñ codapravddho harivo adāśūn | pra ye paśyann aryamaa sacāyos tvayā śūrtā vahamānā apatyam 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

ज॒घ॒न्वान् इ॒न्द्र॒ मि॒त्रेरू॑न् चो॒दऽप्र॑वृद्धः ह॒रि॒ऽवः॒ अदा॑शून् प्र ये पश्य॑न् अ॒र्य॒मण॑म् सचा॑ आ॒योः त्वया॑ शू॒र्ताः वह॑मानाः अप॑त्यम्

 

The Pada Paath - transliteration

jaghanvān | indra | mitrerūn | coda-pravddha | hari-va | adāśūn | pra | ye | paśyan | aryamaam | sacā | āyo | tvayā | śūrtā | vahamānā | apatyam 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१७४।०६

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(जघन्वान्) हतवान् (इन्द्र) सूर्यइव सभेश (मित्रेरून्) मित्र हिंसकान् शत्रून्। अत्र मित्रोपपदाद्रुषघातोर्बाहुलकादौणादिको डुः प्रत्ययः (चोदप्रवृद्धः) चोदेन प्रेरणेन प्रवृद्धः (हरिवः) बह्वैश्वर्ययुक्त (अदाशून्) अदातॄन् (प्र) (ये) (पश्यन्) समीक्षन्ते (अर्य्यमणम्) न्यायेशम् (सचा) संयोगेन (आयोः) प्रापकस्य (त्वया) (शूर्त्ताः) विमर्द्दिताः (वहमानाः) नयन्तो धूर्त्ताः (अपत्यम्) सन्तानम् ॥

हे (हरिवः) बहुत घोड़ोंवाले (इन्द्र) सूर्य के समान सभापति ! (चोदप्रवृद्धः) सदुपदेशों की प्रेरणा से अच्छे प्रकार बढ़े हुए आप (अदाशून्) दान न देने और (मित्ररून्) मित्रों की हिंसा करनेवाले शत्रुओं को (जघन्वान्) मारनेवाले हो इससे (ये) जो (आयोः) दूसरे को सुख पहुंचानेवाले सज्जन के (अपत्यम्) सन्तान को (वहमानाः) पहुंचाने अर्थात् अन्यत्र ले जानेवाले धूर्त्तजन (त्वया) आपने (शूर्त्ताः) छिन्न-भिन्न किये वे (सचा) उस सम्बन्ध से तुम (अर्य्यमणम्) न्यायाधीश को (प्र, पश्यन्) देखते हैं ॥

 

अन्वयः-

हे हरिव इन्द्र चोदप्रवृद्धस्त्वमदाशून् मित्रेरून् जघन्वानसि। अतो यो आयोरपत्यं वहमानास्त्वया शूर्त्ता हतास्ते सचा तत्सम्बन्धेन त्वामर्य्यमणं प्रपश्यन् ॥

 

 

भावार्थः-

ये मित्रवदाभाषमाणाः परिच्छिन्नाश्चतुराः शत्रवः सज्जनानुद्वेजयन्ति तान् राजा समूलघातं हन्यात्। न्यायासने स्थित्वा सुसमीक्ष्यान्यायं विवर्त्तयेत् ॥

जो मित्र के समान बातचीत करते हुए दुष्टप्रकृति चतुर शत्रुजन सज्जनों को उद्वेग कराते उनको राजा समूल जैसे वे नष्ट हों वैसे मारे और न्यायासन पर बैठ कर अच्छे प्रकार देख विचार अन्याय को निवृत्त करे ॥


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