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Mantra Rig 01.170.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 170 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 10 of Adhyaya 4 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 62 of Anuvaak 23 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- विराडनुष्टुप्

स्वर: (Swar) :- गान्धारः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

किं नो॑ भ्रातरगस्त्य॒ सखा॒ सन्नति॑ मन्यसे वि॒द्मा हि ते॒ यथा॒ मनो॒ऽस्मभ्य॒मिन्न दि॑त्ससि

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

किं नो भ्रातरगस्त्य सखा सन्नति मन्यसे विद्मा हि ते यथा मनोऽस्मभ्यमिन्न दित्ससि

 

The Mantra's transliteration in English

ki no bhrātar agastya sakhā sann ati manyase | vidmā hi te yathā mano 'smabhyam in na ditsasi 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

किम् न॒ भ्रा॒तः॒ अ॒ग॒स्त्य॒ सखा॑ सन् अति॑ म॒न्य॒से॒ वि॒द्म हि ते॒ यथा॑ मनः॑ अ॒स्मभ्य॑म् इत् दि॒त्स॒सि॒

 

The Pada Paath - transliteration

kim | na | bhrāta | agastya | sakhā | san | ati | manyase | vidma | hi | te | yathā | mana | asmabhyam | it | na | ditsasi 



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१७०।०३

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(किम्) प्रश्ने (नः) अस्मान् (भ्रातः) बन्धो (अगस्त्य) अगस्तौ विज्ञाने साधो (सखा) मित्रम् (सन्) (अति) (मन्यसे) (विद्म) जानीयाम। अत्र द्व्यचोतस्तिङ् इति दीर्घः। (हि) किल (ते) तव (यथा) (मनः) अन्तःकरणम् (अस्मभ्यम्) (इत्) एव (न) (दित्ससि) दातुमिच्छसि ॥

हे (अगस्त्य) विज्ञान में उत्तमता रखनेवाले (भ्रातः) भाई विद्वान् (सखा) मित्र (सन्) होते हुए आप (नः) हम लोगों को (किम्) क्या (अति, मन्यसे) अतिमान करते हो ? अर्थात् हमारे मान को छोड़कर वर्त्तते हो ? (यथा) जैसे (ते) तुम्हारा अपना (मनः) अन्तःकरण (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (हि) ही (न) न (दित्ससि) देना चाहते हो अर्थात् हमारे लिये अपने अन्तःकरण को उत्साहित क्या नहीं किया चाहते हो ? वैसे (इत्) ही तुमको हम लोग (विद्म) जानें ॥

 

अन्वयः-

हे अगस्त्य भ्रातः विद्वन् सखा संस्त्वं नः किमति मन्यसे ? यथा ते मनोस्मभ्यं हि न दित्ससि तथेत्त्वा वयं विद्म ॥

  

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। ये येषां सखायस्ते मनोकर्मवाग्भिस्तेषां प्रियमाचरेयुर्यावज्ज्ञानं स्वस्य भवेत्तावन्मित्राय समर्पयेत् ॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो जिनके मित्र हों वे मन, वचन और कर्म से उनकी प्रसन्नता का काम करें और जितना विद्या, ज्ञान अपने को हो उतना मित्र के समर्पण करे ॥

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