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Mantra Rig 01.170.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 170 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 10 of Adhyaya 4 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 61 of Anuvaak 23 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- अनुष्टुप्

स्वर: (Swar) :- गान्धारः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

किं न॑ इन्द्र जिघांससि॒ भ्रात॑रो म॒रुत॒स्तव॑ तेभि॑: कल्पस्व साधु॒या मा न॑: स॒मर॑णे वधीः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

किं इन्द्र जिघांससि भ्रातरो मरुतस्तव तेभिः कल्पस्व साधुया मा नः समरणे वधीः

 

The Mantra's transliteration in English

ki na indra jighāsasi bhrātaro marutas tava | tebhi kalpasva sādhuyā mā na samarae vadhī 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

किम् नः॒ इ॒न्द्र॒ जि॒घां॒स॒सि॒ भ्रात॑रः म॒रुतः॑ तव॑ तेभिः॑ क॒ल्प॒स्व॒ सा॒धु॒ऽया मा नः॒ स॒म्ऽअर॑णे व॒धीः॒

 

The Pada Paath - transliteration

kim | na | indra | jighāsasi | bhrātara | maruta | tava | tebhi | kalpasva | sādhu-yā | mā | na | sam-arae | vadhīḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१७०।०२

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(किम्) (नः) अस्मान् (इन्द्र) सभेश विद्वन् (जिघांससि) हन्तुमिच्छसि (भ्रातरः) बन्धवः (मरुतः) मनुष्याः (तव) (तेभिः) तैः सह (कल्पस्व) समर्थो भव (साधुया) साधुना कर्मणा (मा) (नः) अस्मान् (समरणे) सङ्ग्रामे। समरण इति संग्रामना०। निघं० २।१। (वधीः) हन्याः ॥

हे (इन्द्र) सभापति विद्वान् ! जो हम (मरुतः) मनुष्य लोग (तव) आपके (भ्रातरः) भाई हैं उन (नः) हम लोगों को (किम्) क्या (जिंघाससि) मारने की इच्छा करते हो ? (तेभिः) उन हम लोगों के साथ (साधुया) उत्तम काम से (कल्पस्व) समर्थ होओ और (समरणे) संग्राम में (नः) हम लोगों को (मा, वधीः) मत मारिये ॥

 

अन्वयः-

हे इन्द्र ये वयं मरुतस्तव भ्रातरः स्मस्तान्नोऽस्मान् किं जिघांससि ? तेभिः साधुया कल्पस्व समरणे नो मा वधीः

 

 

भावार्थः-

ये बन्धून् पीडयितुमिच्छेयुस्ते सदा पीडिता जायन्ते ये रक्षितुमिच्छन्ति ते समर्था भवन्ति। ये सर्वोपकारकास्तेषां किञ्चिदप्यप्रियं न प्राप्तं भवति ॥

जो कोई बन्धुओं को पीड़ा देना चाहें वे सदा पीड़ित होते हैं और जो बन्धुओं की रक्षा किया चाहते हैं वे समर्थ होते हैं अर्थात् सब काम उनके प्रबलता से बनते हैं जो सबका उपकार करनेवाले हैं, उनको कुछ भी काम अप्रिय नहीं प्राप्त होता ॥


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