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Mantra Rig 01.170.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 170 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 10 of Adhyaya 4 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 60 of Anuvaak 23 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- स्वराडनुष्टुप्

स्वर: (Swar) :- गान्धारः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

नू॒नमस्ति॒ नो श्वः कस्तद्वे॑द॒ यदद्भु॑तम् अ॒न्यस्य॑ चि॒त्तम॒भि सं॑च॒रेण्य॑मु॒ताधी॑तं॒ वि न॑श्यति

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

नूनमस्ति नो श्वः कस्तद्वेद यदद्भुतम् अन्यस्य चित्तमभि संचरेण्यमुताधीतं वि नश्यति

 

The Mantra's transliteration in English

na nūnam asti no śva kas tad veda yad adbhutam | anyasya cittam abhi sacareyam utādhīta vi naśyati 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

नू॒नम् अस्ति॑ नो इति॑ श्वः कः तत् वे॒द॒ यत् अद्भु॑तम् अ॒न्यस्य॑ चि॒त्तम् अ॒भि स॒म्ऽच॒रेण्य॑म् उ॒त आऽधी॑तम् वि न॒श्य॒ति॒

 

The Pada Paath - transliteration

na | nūnam | asti | no iti | śva | ka | tat | veda | yat | adbhutam | anyasya | cittam | abhi | sam-careyam | uta | ādhītam | vi | naśyati 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१७०।०१

मन्त्रविषयः-

पुनः प्रकारान्तरेण विद्वद्गुणानाह।

अब एकसौ सत्तरवें सूक्त का आरम्भ है। उसमें आरम्भ से प्रकारान्तर करके विद्वानों के गुणों का वर्णन करते हैं।

 

पदार्थः-

(न) निषेधे (नूनम्) निश्चितम् (अस्ति) विद्यते (नो) (श्वः) आगामिदिने (कः) (तत्) (वेद) जानाति (यत्) (अद्भुतम्) आश्चर्य्यभूतमिव वर्त्तमानम् (अन्यस्य) (चित्तम्) अन्तःकरणस्य स्मरणात्मिकां वृत्तिम् (अभि) (सञ्चरेण्यम्) सम्यक् चरितुं ज्ञातुं योग्यम् (उत) अपि (आधीतम्) समन्ताद्धृतम् (वि) (नश्यति) अदृष्टं भवति ॥

हे मनुष्यो ! (यत्) जो (अन्यस्य) औरों को (सञ्चरेण्यम्) अच्छे प्रकार जानने योग्य (चित्तम्) अन्तःकरण की स्मरणात्मिका वृत्ति (उत) और (आधीतम्) सब ओर से धारण किया हुआ विषय (न) न (अभि, वि, नश्यति) नहीं विनाश को प्राप्त होता न आज होकर (नूनम्) निश्चित रहता (अस्ति) है और (नो) न (श्वः) अगले दिन निश्चित रहता है (तत्) उस (अद्भुतम्) आश्चर्यस्वरूप के समान वर्त्तमान को (कः) कौन (वेद) जानता है ॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या यदन्यस्य सञ्चरेण्यं चित्तमुताधीतं नाभि विनश्यति नाद्य भूत्वा नूनमस्ति नो श्वश्च तद्द्भुतं को वेद ॥

 

 

भावार्थः-

यो जीवो भूत्वा न जायते भूत्वा न विनश्यति नित्य आश्चर्यगुणकर्मस्वभावोनादिश्चेतनो वर्त्तते तस्य वेत्ताप्याश्चर्य्यभूतः ॥

जो जीवरूप होकर उत्पन्न नहीं होता और न उत्पन्न होकर विनाश को प्राप्त होता है नित्य आश्चर्य गुण, कर्म, स्वभाववाला अनादि चेतन है उसका जाननेवाला भी आश्चर्यस्वरूप होता है ॥

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