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Mantra Rig 01.167.010

MANTRA NUMBER:

Mantra 10 of Sukta 167 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 5 of Adhyaya 4 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 40 of Anuvaak 23 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः

देवता (Devataa) :- इन्द्रो मरुच्च

छन्द: (Chhand) :- निचृत्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

व॒यम॒द्येन्द्र॑स्य॒ प्रेष्ठा॑ व॒यं श्वो वो॑चेमहि सम॒र्ये व॒यं पु॒रा महि॑ नो॒ अनु॒ द्यून्तन्न॑ ऋभु॒क्षा न॒रामनु॑ ष्यात्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

वयमद्येन्द्रस्य प्रेष्ठा वयं श्वो वोचेमहि समर्ये वयं पुरा महि नो अनु द्यून्तन्न ऋभुक्षा नरामनु ष्यात्

 

The Mantra's transliteration in English

vayam adyendrasya preṣṭhā vaya śvo vocemahi samarye | vayam purā mahi ca no anu dyūn tan na bhukā narām anu yāt 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

व॒यम् अ॒द्य इन्द्र॑स्य प्रेष्ठाः॑ व॒यम् श्वः वो॒चे॒म॒हि॒ स॒ऽम॒र्ये व॒यम् पु॒रा महि॑ च॒ नः॒ अनु॑ द्यून् तत् नः॒ ऋ॒भु॒क्षाः न॒राम् अनु॑ स्या॒त्

 

The Pada Paath - transliteration

vayam | adya | indrasya | preṣṭ | vayam | śva | vocemahi | sa-marye | vayam | purā | mahi | ca | na | anu | dyūn | tat | na | bhukā | narām | anu | syāt 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१६७।१०

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(वयम्) (अद्य) अस्मिन् दिने (इन्द्रस्य) परमैश्वर्ययुक्तस्य धार्मिकस्य विदुषः (प्रेष्ठाः) अतिशयेन प्रियाः (वयम्) (श्वः) आगामिदिने (वोचेमहि) वदेम। अत्राडभावः। (समर्ये) संग्रामे (वयम्) (पुरा) (महि) महत् (च) (नः) अस्माकम् (अनु) (द्यून्) दिनानि (तत्) (नः) अस्मभ्यम् (ऋभुक्षाः) मेधावी (नराम्) मनुष्याणाम् (अनु) आनुकूल्ये (स्यात्) ॥१०॥

हे विद्वानो ! (वयम्) हम लोग (अद्य) आज (इन्द्रस्य) परमविद्या और ऐश्वर्ययुक्त धार्मिक विद्वान् के (प्रेष्ठाः) अत्यन्त प्रिय हैं (वयम्) हम लोग (श्वः) कल्ह के आनेवाले दिन (समर्य्ये) संग्राम में (वोचेमहि) कहें (च) और (पुरा) प्रथम जो (नः) हम लोगों का (महि) बड़प्पन है (तत्) उसको (वयम्) हम लोग (अनु, द्यून्) प्रतिदिन कहें और (नराम्) मनुष्यों के बीच (नः) हमारे लिये (ऋभुक्षाः) मेधावी बुद्धिमान् वीर पुरुष (अनु, ष्यात्) अनुकूल हों ॥१०॥

 

अन्वयः-

हे विद्वांसो वयमद्य इन्द्रस्य प्रेष्ठाः स्मो वयं श्वः समर्ये वोचेमहि। पुरा यच्च नो महि तद्वयमनु द्यून् वोचेमहि नरां मनुष्याणां मध्ये न ऋभुक्षा अनुष्यात् ॥१०॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये विद्वत्प्रीतिं युद्धेषूत्साहं मनुष्यादीनां प्रियं च पुरस्तादाचरन्ति ते सर्वेषां प्रिया भवन्ति ॥१०॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वानों से प्रीति, युद्ध में उत्साह और मनुष्यादिकों का प्रिय काम का पहिले से आचरण करते हैं सबके पियारे होते हैं ॥१०॥


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