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Mantra Rig 01.167.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 167 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 4 of Adhyaya 4 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 31 of Anuvaak 23 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यो मैत्रावरुणिः

देवता (Devataa) :- इन्द्रो मरुच्च

छन्द: (Chhand) :- भुरिक्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

स॒हस्रं॑ इन्द्रो॒तयो॑ नः स॒हस्र॒मिषो॑ हरिवो गू॒र्तत॑माः स॒हस्रं॒ रायो॑ माद॒यध्यै॑ सह॒स्रिण॒ उप॑ नो यन्तु॒ वाजा॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

सहस्रं इन्द्रोतयो नः सहस्रमिषो हरिवो गूर्ततमाः सहस्रं रायो मादयध्यै सहस्रिण उप नो यन्तु वाजाः

 

The Mantra's transliteration in English

sahasra ta indrotayo na sahasram io harivo gūrtatamā | sahasra rāyo mādayadhyai sahasria upa no yantu vājā 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

स॒हस्र॑म् ते॒ इ॒न्द्र॒ ऊ॒तयः॑ नः॒ स॒हस्र॑म् इषः॑ ह॒रि॒ऽवः॒ गू॒र्तऽत॑माः स॒हस्र॑म् रायः॑ मा॒द॒यध्यै॑ स॒ह॒स्रिणः॑ उप॑ नः॒ य॒न्तु॒ वाजाः॑

 

The Pada Paath - transliteration

sahasram | te | indra | ūtaya | na | sahasram | ia | hari-va | gūrta-tamā | sahasram | rāya | mādayadhyai | sahasria | upa | na | yantu | vājāḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१६७।०१

मन्त्रविषयः-

अथ सज्जनगुणानाह।

अब एकसौ सरसठवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में सज्जनों के गुणों का वर्णन करते हैं।

 

पदार्थः-

(सहस्रम्) असंख्या (ते) तव (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त सम्राट् (ऊतयः) रक्षाः (नः) अस्माकम् (सहस्रम्) (इषः) अन्नादीनि (हरिवः) धारणाऽऽकर्षणादियुक्त (गूर्त्ततमाः) अतिशयिता उद्यमाः (सहस्रम्) (रायः) श्रियः (मादयध्यै) मादयितुमानन्दयितुम् (सहस्रिणः) सहस्रमसंख्याता बहवः पदार्थाः सन्ति येषु ते (उप) (नः) अस्मान् (यन्तु) प्राप्नुवन्तु (वाजाः) बोधाः ॥१॥

हे (हरिवः) धारणाकर्षणादियुक्त (इन्द्र) परमैश्वर्यवाले विद्वान् ! जो (ते) आपकी (सहस्रम्) सहस्रों (ऊतयः) रक्षायें (सहस्रम्) सहस्रों (इषः) अन्न आदि पदार्थ (सहस्रम्) सहस्रों (गूर्त्ततमाः) उत्यन्त उद्य वा (रायः) धन हैं वे (नः) हमारे हों और (सहस्रिणः) सहस्रों पदार्थ जिनमें विद्यमान वे (वाजाः) बोध (मादयध्यै) आनन्दित करने के लिये (नः) हम लोगों को (उप, यन्तु) निकट प्राप्त हों ॥१॥

 

अन्वयः-

हे हरिव इन्द्र यास्ते सहस्रमूतयः सहस्रमिषः सहस्रं गूर्त्ततमा रायः सन्ति ता नः सन्तु। सहस्रिणो वाजा मादयध्यै नोऽस्मानुपयन्तु ॥१॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैर्यानि भाग्यशालिनां सर्वोत्तमसामग्र्या यथायोग्यक्रियया चाऽसंख्यानि सुखानि भवन्ति तान्यस्माकं सन्त्विति मत्वा सततं प्रयतितव्यम् ॥१॥

मनुष्यों को जो भाग्यशालियों को सर्वोत्तम सामग्री से और यथायोग्य क्रिया से असंख्य सुख होते हैं वे हमारे हों, ऐसा मानकर निरन्तर प्रयत्न करना चाहिये ॥१॥

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