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Mantra Rig 01.165.013

MANTRA NUMBER:

Mantra 13 of Sukta 165 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 26 of Adhyaya 3 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 13 of Anuvaak 23 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

को न्वत्र॑ मरुतो मामहे व॒: प्र या॑तन॒ सखीँ॒रच्छा॑ सखायः मन्मा॑नि चित्रा अपिवा॒तय॑न्त ए॒षां भू॑त॒ नवे॑दा ऋ॒ताना॑म्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

को न्वत्र मरुतो मामहे वः प्र यातन सखीँरच्छा सखायः मन्मानि चित्रा अपिवातयन्त एषां भूत नवेदा ऋतानाम्

 

The Mantra's transliteration in English

ko nv atra maruto māmahe va pra yātana sakhīm̐r acchā sakhāya | manmāni citrā apivātayanta eām bhūta navedā ma tānām 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

कः नु अत्र॑ म॒रु॒तः॒ म॒म॒हे॒ वः॒ प्र या॒त॒न॒ सखी॒न् अच्छ॑ स॒खा॒यः॒ मन्मा॑नि चि॒त्राः॒ अ॒पि॒ऽवा॒तय॑न्तः ए॒षाम् भू॒त॒ नवे॑दाः मे॒ ऋ॒ताना॑म्

 

The Pada Paath - transliteration

ka | nu | atra | maruta | mamahe | va | pra | yātana | sakhīn | accha | sakhāya | manmāni | citrā | api-vātayanta | eām | bhūta | navedā | me | tānām 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१६५।१३

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(कः) (नु) सद्यः (अत्र) (मरुतः) (मामहे*) महयति। अत्र मह पूजायामित्यस्मात् लटि बहुलं छन्दसीति श्लुर्विकरणो व्यत्ययेनात्मनेपदं तुजादित्वाद्दीर्घः। (वः) युष्मान् (प्र) (यातन) प्राप्नुवन्तु (सखीन्) सुहृदः (अच्छ) (सखायः) (मन्मानि) विज्ञानानि (चित्राः) अद्भुताः (अपिवातयन्तः) शीघ्रं गमयन्तः (एषाम्) (भूत) भवत (नवेदाः) न विद्यन्ते दुःखानि येषु (मे) मम (ऋतानाम्) सत्यानाम् ॥१३॥ [*म॒म॒हे॒- सम्पादक ॥]

हे (मरुतः) प्राणवत्प्रिय विद्वानो ! (अत्र) इस स्थान में (वः) तुम लोगों को (कः) कौन (नु) शीघ्र (मामहे*) सत्कारयुक्त करता है। हे (सखायः) मित्र विद्वानो ! तुम (सखीन्) अपने मित्रों को (अच्छ) अच्छे प्रकार (प्र, यातन) प्राप्त होओ। हे (चित्राः) अद्भुत कर्म करनेवाले विद्वानो ! (मन्मानि) विज्ञानों को (अपिवातयन्तः) शीघ्र पहुंचाते हुए तुम (मे) मेरे (एषाम्) इन (ऋतानाम्) सत्य व्यवहारों के बीच (नवेदाः) नवेद अर्थात् जिनमें दुःख नहीं है ऐसे (भूत) होओ ॥१३॥

 

अन्वयः-

हे मरुतोऽत्र वः को नु मामहे। हे सखायो यूयं सखीनच्छ प्रयातन। हे चित्रा मन्मान्यपिवातयन्तो यूयं मे ऋतानामेषां नवेदा भूत ॥१३॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्याः सर्वेषु सुहृदो भूत्वा विद्यां प्रापय्य सर्वान् धर्म्यपुरुषार्थे संयोजयन्तु। यत एते सर्वत्र सत्कृताः स्युः सत्याऽसत्ये विज्ञायान्यानुपदिशेयुः ॥१३॥  

मनुष्य सबमें मित्र हो और उनको विद्या पहुंचाकर सबको धर्मयुक्त पुरषार्थ में संयुक्त करें। जिससे ये सर्वत्र सत्कारयुक्त हों और आप सत्य-असत्य जान औरों को उपदेश दें ॥१३॥


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