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Mantra Rig 01.165.010

MANTRA NUMBER:

Mantra 10 of Sukta 165 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 25 of Adhyaya 3 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 10 of Anuvaak 23 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- भुरिक्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

एक॑स्य चिन्मे वि॒भ्व१॒॑स्त्वोजो॒ या नु द॑धृ॒ष्वान्कृ॒णवै॑ मनी॒षा अ॒हं ह्यु१॒॑ग्रो म॑रुतो॒ विदा॑नो॒ यानि॒ च्यव॒मिन्द्र॒ इदी॑श एषाम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

एकस्य चिन्मे विभ्वस्त्वोजो या नु दधृष्वान्कृणवै मनीषा अहं ह्युग्रो मरुतो विदानो यानि च्यवमिन्द्र इदीश एषाम्

 

The Mantra's transliteration in English

ekasya cin me vibhv astv ojo yā nu dadhṛṣvān kṛṇavai manīā | aha hy ugro maruto vidāno yāni cyavam indra id īśa eām 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

एक॑स्य चि॒त् मे॒ वि॒ऽभु अ॒स्तु॒ ओजः॑ या नु द॒धृ॒ष्वान् कृ॒णवै॑ म॒नी॒षा अ॒हम् हि उ॒ग्रः म॒रु॒तः॒ विदा॑नः यानि॑ च्यव॑म् इन्द्रः॑ इत् ई॒शे॒ ए॒षा॒म्

 

The Pada Paath - transliteration

ekasya | cit | me | vi-bhu | astu | oja | yā | nu | dadhṛṣvān | kṛṇavai | manīā | aham | hi | ugra | maruta | vidāna | yāni | cyavam | indra | it | īśe | eām 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१६५।१०

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(एकस्य) (चित्) अपि (मे) मम (विभु) व्यापकम् (अस्तु) भवतु (ओजः) बलम् (या) यानि (नु) सद्यः (दधृष्वान्) प्रसोढा (कृणवै) कर्त्तुं शक्नुयाम् (मनीषा) प्रज्ञया (अहम्) (हि) किल (उग्रः) तीव्रः (मरुतः) मरुद्वद्वर्त्तमानाः (विदानः) विद्वान् (यानि) (च्यवम्) प्राप्नुयाम् (इन्द्रः) दुःखच्छेत्ता (इत्) एव (ईशे) (एषाम्) प्राणिनाम् ॥१०

हे (मरुतः) पवनों के समान वर्त्तमान सज्जनो ! जैसे (एकस्य) एक (चित्) ही (मे) मेरे को (विभु) व्यापक (ओजः) बल (अस्तु) हो और (या) जिनको (दधृष्वान्) अच्छे प्रकार सहनेवाला मैं होऊं वैसे वह बल (हि) निश्चय से तुम्हारा हो और उनका सहन तुम करो। जैसे (अहम्) मैं (मनीषा) बुद्धि से (नु) शीघ्र (कृणवै) विद्या कर सकूं और (उग्रः) तीव्र (विदानः) विद्वान् (इन्द्र) दुःख का छिन्न-भिन्न करनेवाला होता हुआ (यानि) जिन पदार्थों को (च्यवम्) प्राप्त होऊं और (एषाम्, इत्) इन्हीं का (ईशे) स्वामी होऊं वैसे तुम वर्त्तो ॥१०

 

अन्वयः-

हे मरुतो यथैकस्य चिन्मे विभ्वोजोऽस्तु या दधृष्वानहं तथा तद्धि वोऽस्तु तानि सहत यथाहं मनीषा नु विद्या कृणवै उग्रो विदान इन्द्रः सन् यानि च्यवमेषामिदीशे च तथा यूयं वर्त्तध्वम् १०

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा जगदीश्वरोऽनन्तपराक्रमवान् व्यापकोऽस्ति तथा विद्वांसः सर्वेषुः शास्त्रेषु धर्मकृत्येषु च व्याप्नुवन्तु न्यायाधीशा भूत्वैतेषां मनुष्यादीनां सुखं संपादयन्तु १०॥   

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जगदीश्वर अनन्त पराक्रमी और व्यापक है वैसे विद्वान् जन समस्त शास्त्र और धर्मकृत्यों में व्याप्त होवें और न्यायाधीश होकर इन मनुष्यादि के सुखों को संपादन करें ॥१०

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