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mantra Rig 01.165.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 165 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 24 of Adhyaya 3 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 2 of Anuvaak 23 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- अगस्त्यः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

कस्य॒ ब्रह्मा॑णि जुजुषु॒र्युवा॑न॒: को अ॑ध्व॒रे म॒रुत॒ व॑वर्त श्ये॒नाँ इ॑व॒ ध्रज॑तो अ॒न्तरि॑क्षे॒ केन॑ म॒हा मन॑सा रीरमाम

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

कस्य ब्रह्माणि जुजुषुर्युवानः को अध्वरे मरुत ववर्त श्येनाँ इव ध्रजतो अन्तरिक्षे केन महा मनसा रीरमाम

 

The Mantra's transliteration in English

kasya brahmāi jujuur yuvāna ko adhvare maruta ā vavarta | śyenām̐ iva dhrajato antarike kena mahā manasā rīramāma 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

कस्य॑ ब्रह्मा॑णि जु॒जु॒षुः॒ युवा॑नः कः अ॒ध्व॒रे म॒रुतः॑ व॒व॒र्त॒ श्ये॒नान्ऽइ॑व ध्रज॑तः अ॒न्तरि॑क्षे केन॑ म॒हा मन॑सा री॒र॒मा॒म॒

 

The Pada Paath - transliteration

kasya | brahmāi | jujuu | yuvāna | ka | adhvare | maruta | ā | vavarta | śyenān-iva | dhrajata | antarike | kena | mahā | manasā | rīramāma 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१६५।०२

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(कस्य) (ब्रह्माणि) बृहन्ति यानि धनान्यन्नानि वा तानि। ब्रह्मेति धनना०। निघं० २।१०। अन्ननाम च० निघं० २।। (जुजुषुः) सेवन्ते। अत्र बहुलं छन्दसीति शपः श्लुः। (युवानः) ब्रह्मचर्येण विद्यया च प्राप्तयौवनाः (कः) (अध्वरे) अहिंसनीये धर्म्ये व्यवहारे (मरुतः) वायवइव (आ) समन्तात् (ववर्त्तं) वर्त्तते। अत्रापि शपःश्लुस्तस्य स्थाने तप् च। (श्येनानिव) अश्वानिव। श्येनास इत्यश्वना०। निघं० १।१। (ध्रजतः) गच्छतः (अन्तरिक्षे) आकाशे (केन) (महा) महता (मनसा) (रीरमाम) सर्वान् रमयेम ॥

जो (मरुतः) पवनों के समान वेगयुक्त (युवानः) ब्रह्मचर्य और विद्या से युवावस्था को प्राप्त विद्वान् (कस्य) किसके (ब्रह्माणि) वृद्धि को प्राप्त होते जो अन्न वा धन उनको (जुजुषुः) सेवते हैं और (कः) कौन इस (अध्वरे) न नष्ट करने योग्य धर्मयुक्त व्यवहार में (आ, ववर्त्त) अच्छे प्रकार वर्त्तमान है, हम लोग (केन) कौन (महा) बड़े (मनसा) मन से (ध्रजतः) जानेवाले (श्येनानिव) पोड़ों के समान किनको लेकर (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में (रीरमाम) सबको रमावें ॥

 

अन्वयः-

ये मरुतइव युवानो विद्वांसः कस्य ब्रह्माणि जुजुषुः। कोऽस्मिन्नध्वर आववर्त्त वयं केन महा मनसा ध्रजतो श्येनानिव कान् गृहीत्वाऽन्तरिक्षे रीरमाम

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। यथा वायवो जगत्स्थान् पदार्थान् सेवन्ते तथा ब्रह्मचर्यविद्याबोधाभ्यां परमश्रियं सेवन्ताम्। यथाऽन्तरिक्षे उड्डीयमानान् श्येनादीन् पक्षिणः पश्यन्ति तथैव सभूगोला वयमाकाशे रमेमहि सर्वान् रमयामः। एतत् ज्ञातुं विद्वांसएव शक्नुवन्ति ॥  

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे वायु संसारस्थ पदार्थों को सेवन करते हैं वैसे ब्रह्मचर्य और विद्या के बोध से परम श्री को सेवें। जैसे अन्तरिक्ष में उड़ते हुए श्येनादि पक्षियों को देखते हैं वैसे ही भूगोल के साथ हम लोग आकाश में रमें और सबको रमावें, इसको विद्वान् ही जान सकते हैं ॥

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