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Mantra Rig 01.163.008

MANTRA NUMBER:

Mantra 8 of Sukta 163 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 12 of Adhyaya 3 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 66 of Anuvaak 22 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- अश्वोऽग्निः

छन्द: (Chhand) :- विराट्त्रिस्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अनु॑ त्वा॒ रथो॒ अनु॒ मर्यो॑ अर्व॒न्ननु॒ गावोऽनु॒ भग॑: क॒नीना॑म् अनु॒ व्राता॑स॒स्तव॑ स॒ख्यमी॑यु॒रनु॑ दे॒वा म॑मिरे वी॒र्यं॑ ते

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अनु त्वा रथो अनु मर्यो अर्वन्ननु गावोऽनु भगः कनीनाम् अनु व्रातासस्तव सख्यमीयुरनु देवा ममिरे वीर्यं ते

 

The Mantra's transliteration in English

anu tvā ratho anu maryo arvann anu gāvo 'nu bhaga kanīnām | anu vrātāsas tava sakhyam īyur anu devā mamire vīrya te 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अनु॑ त्वा॒ रथः॑ अनु॑ मर्यः॑ अ॒र्व॒न् अनु॑ गावः॑ अनु॑ भगः॑ क॒नीना॑म् अनु॑ व्राता॑सः तव॑ स॒ख्यम् ई॒युः॒ अनु॑ दे॒वाः म॒मि॒रे॒ वी॒र्य॑म् ते॒

 

The Pada Paath - transliteration

anu | tvā | ratha | anu | marya | arvan | anu | gāva | anu | bhaga | kanīnām | anu | vrātāsa | tava | sakhyam | īyu | anu | devā | mamire | vīryam | te 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१६३।०८

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(अनु) (त्वा) त्वाम् (रथः) विमानादियानम् (अनु) (मर्यः) मरणधर्मा मनुष्यः (अर्वन्) अश्ववद्वर्त्तमान (अनु) (गावः) धेनवः (अनु) (भगः) ऐश्वर्यम् (कनीनाम्) कामयमानानाम् (अनु) (व्रातासः) व्रतेषु सत्याचरणेषु भवाः (तव) (सख्यम्) सख्युर्भावः कर्म वा (ईयुः) प्राप्नुयुः (अनु) (देवाः) विद्वांसः (ममिरे) निर्मिमते (वीर्यम्) पराक्रमम् (ते) तव ॥८॥

हे (अर्वन्) घोड़े के समान वर्त्तमान ! जिस (त्वा) तेरे (अनु) पीछे (रथः) विमानादि रथ फिर (अनु) पीछे (मर्य्यः) मरण धर्म रखनेवाला मनुष्य फिर (अनु) पीछे (गावः) गौयें और (कनीनाम्) कामना करते हुए सज्जनों को (अनु) पीछे (भगः) ऐश्वर्य तथा (व्रातासः) सत्य आचरणों में प्रसिद्ध (देवाः) विद्वान् जन (ते) तेरे (वीर्यम्) पराक्रम को (अनु, ममिरे) अनुकूलता से सिद्ध करते हैं वे उक्त विद्वान् (तव) तेरी (सख्यम्) मित्रता वा मित्र के काम को (अनु, ईयुः) अनुकूलता से प्राप्त होवें ॥८॥

 

अन्वयः-

हे अर्वन् यं त्वाऽनु रथोऽनु मर्य्योऽनु गावः कनीनामनु भगो व्रातासो देवास्ते वीर्यमनु ममिरे ते तस्य तव सख्यमन्वीयुः ॥८॥

 

 

भावार्थः-

यथाऽग्निमनुयानानि मनुष्या गच्छन्ति तथाऽध्यापकोपदेशकावनु विज्ञानं लभन्ते ये विदुषः सखीन् कुर्वन्ति ते सत्याचारा वीर्यवन्तो जायन्ते ॥८॥

जैसे अग्नि के अनुकूल विमानादि यानों को मनुष्य प्राप्त होते हैं वैसे अध्यापक और उपदेशक के अनुकूल विज्ञान को प्राप्त होते हैं। जो विद्वानों को मित्र करते हैं वे सत्याचरणशील और पराक्रमवान् होते है ॥८॥

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