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Mantra Rig 01.163.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 163 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 11 of Adhyaya 3 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 60 of Anuvaak 22 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- अश्वोऽग्निः

छन्द: (Chhand) :- भुरिक्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

य॒मेन॑ द॒त्तं त्रि॒त ए॑नमायुन॒गिन्द्र॑ एणं प्रथ॒मो अध्य॑तिष्ठत् ग॒न्ध॒र्वो अ॑स्य रश॒नाम॑गृभ्णा॒त्सूरा॒दश्वं॑ वसवो॒ निर॑तष्ट

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यमेन दत्तं त्रित एनमायुनगिन्द्र एणं प्रथमो अध्यतिष्ठत् गन्धर्वो अस्य रशनामगृभ्णात्सूरादश्वं वसवो निरतष्ट

 

The Mantra's transliteration in English

yamena datta trita enam āyunag indra eam prathamo adhy atiṣṭhat | gandharvo asya raśanām agbhāt sūrād aśva vasavo nir ataṣṭ

 

The Pada Paath (Sanskrit)

य॒मेन॑ द॒त्तम् त्रि॒तः ए॒न॒म् अ॒यु॒न॒क् इन्द्रः॑ ए॒न॒म् प्र॒थ॒मः अधि॑ अ॒ति॒ष्ठ॒त् ग॒न्ध॒र्वः अ॒स्य॒ र॒श॒नाम् अ॒गृ॒भ्णा॒त् सूरा॑त् अश्व॑म् व॒स॒वः॒ निः अ॒त॒ष्ट॒

 

The Pada Paath - transliteration

yamena | dattam | trita | enam | ayunak | indra | enam | prathama | adhi | ati ṣṭhat | gandharva | asya | raśanām | agbhāt | sūrāt | aśvam | vasava | ni | ataṣṭ


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१६३।०२

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(यमेन) नियामंकेन (दत्तम्) (त्रितः) संप्लावकः। अत्रौणादिकस्तॄधातोः कितच् प्रत्ययः। (एनम्) पूर्वोक्तमुपस्तुत्यम् (युनक्) शिल्पकार्ये नियुञ्जीत (इन्द्रः) विद्युत् (एनम्) अत्र वाछन्दसीत्यप्राप्त णत्वम्। (प्रथमः) प्रख्यातिमान् (अधि) (अतिष्ठत्) तिष्ठेत् (गन्धर्वः) यो गां पृथिवीं धरति स वायुः (अस्य) (रशनाम्) स्नेहिकां क्रियाम् (अगृभ्णात्) गृह्णीयात् (सूरात्) सूर्यात् (अश्वम्) आशु गमयितारम् (वसवः) चतुर्विंशतिवार्षिकब्रह्मचर्येण कृतविद्याः (निः) (अतष्ट) तक्षेरन् ॥२॥

हे (वसवः) चौबीस वर्ष ब्रह्मचर्य के सेवन से विद्या को प्राप्त हुए सज्जनो ! तुम जिस (यमेन) नियमकर्त्ता वायु से (दत्तम्) दिये हुए (एनम्) इस पूर्वोक्त प्रशंसित अग्नि को (त्रितः) अनेकों पदार्थ वा अनेकों व्यवहारों को तरनेवाला (इन्द्रः) बिजुलीरूप अग्नि (आयुनक्) शिल्प कामों में नियुक्त करे (प्रथमः) वा प्रख्यातिमान् पुरुष (एनम्) इस उक्त प्रशंसित अग्नि का (अध्यतिष्ठत्) अधिष्ठाता हो वा (गन्धर्वः) पृथिवी को धारण करनेवाला वायु (अस्य) इसकी (रशनाम्) स्नेह क्रिया को और (सूरात्) सूर्य से (अश्वम्) शीघ्रगमन करानेवाले अग्नि को (अगृभ्णात्) ग्रहण करे उसको (निरतष्ट) निरन्तर काम में लाओ ॥२॥

 

अन्वयः-

हे वसवो यूयं यं यमेन दत्तमेनं त्रित इन्द्रोऽयुनक् प्रथम एनमध्यतिष्ठद्गन्धर्वोऽस्य रशनां सूराद्यमश्वं चागृभ्णात्तं निरतष्ट ॥२॥

 

 

भावार्थः-

ये मनुष्या विद्वदुपदेशप्राप्तां तां विद्यां गृहीत्वा विद्युज्जनितकारणाद्विस्तृतं वायुना धृतं सूर्योद्भावितमाशुगामिनमग्निं प्रयोजयन्ति ते दारिघ्रच्छेत्तारो जायन्ते ॥२॥

जो मनुष्य विद्वानों के उपदेश से पाई हुई विद्या को ग्रहण कर बिजुली से उत्पन्न हुए कारण से फैले वायु से धारण किये सूर्य से प्रकट हुए शीघ्रगामी अग्नि को प्रयोजन में लाते हैं वे दरिद्रपन के नाश करनेवाले होते हैं ॥२॥

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