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Mantra Rig 01.160.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 160 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 3 of Adhyaya 3 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 20 of Anuvaak 22 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- द्यावापृथिव्यौ

छन्द: (Chhand) :- निचृज्जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

वह्नि॑: पु॒त्रः पि॒त्रोः प॒वित्र॑वान्पु॒नाति॒ धीरो॒ भुव॑नानि मा॒यया॑ धे॒नुं च॒ पृश्निं॑ वृष॒भं सु॒रेत॑सं वि॒श्वाहा॑ शु॒क्रं पयो॑ अस्य दुक्षत

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

वह्निः पुत्रः पित्रोः पवित्रवान्पुनाति धीरो भुवनानि मायया धेनुं पृश्निं वृषभं सुरेतसं विश्वाहा शुक्रं पयो अस्य दुक्षत

 

The Mantra's transliteration in English

sa vahni putra pitro pavitravān punāti dhīro bhuvanāni māyayā | dhenu ca pśni vṛṣabha suretasa viśvāhā śukram payo asya dukata 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

सः वह्निः॑ पु॒त्रः पि॒त्रोः प॒वित्र॑ऽवान् पु॒नाति॑ धीरः॑ भुव॑नानि मा॒यया॑ धे॒नुम् च॒ पृश्नि॑म् वृ॒ष॒भम् सु॒ऽरेत॑सम् वि॒श्वाहा॑ शु॒क्रम् पयः॑ अ॒स्य॒ धु॒क्ष॒त॒

 

The Pada Paath - transliteration

sa | vahni | putra | pitro | pavitra-vān | punāti | dhīra | bhuvanāni | māyayā | dhenum | ca | pśnim | vṛṣabham | su-retasam | viśvāhā | śukram | paya | asya | dhukata 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१६०।०३

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(सः) (वह्निः) वोढा (पुत्रः) अपत्यमिव (पित्रोः) वाय्वाकाशयोः (पवित्रवान्) बहूनि पवित्राणि कर्माणि विद्यन्ते यस्य सः (पुनाति) पवित्रीकरोति (धीरः) ध्यानवान् (भुवनानि) लोकान् (मायया) प्रज्ञया (धेनुम्) गामिव वर्त्तमानां वाणीम् (च) (पृश्निम्) सूर्यम् (वृषभम्) सर्वलोकस्तम्भकम् (सुरेतसम्) सुष्ठुबलम् (विश्वाहा) सर्वाणि दिनानि (शुक्रम्) आशुकरम् (पयः) दुग्धम् (अस्य) वह्नेः (धुक्षतः) प्रदुहन्ति। अत्र वाच्छन्दसीति भष्भावः ॥३॥

हे मनुष्यो ! (पवित्रवान्) जिसके बहुत शुद्ध कर्म वर्त्तमान (पित्रोः) तथा जो वायु और आकाश के (पुत्रः) सन्तान के समान वर्त्तमान है (सः) वह (वह्निः) पदार्थों की प्राप्ति करानेवाला अग्नि (भुवनानि) लोकों को (पुनाति) पवित्र करता है। जो (धेनुम्) गौ के समान वर्त्तमान वाणी (सुरेतसम्) सुन्दर जिसका बल जो (वृषभम्) सब लोकों को रोकनेवाला (पृश्निम्) सूर्य है उस (शुक्रम्) शीघ्रता करनेवाले को और (पयः) दूध को (च) और (विश्वाहा) सब दिनों को पवित्र करता है, जिसको (धीरः) ध्यानवान् पुरुष (मायया) उत्तम बुद्धि से जानता है (अस्य) उस अग्नि की उत्तेजना से अभीष्ट सिद्धि को तुम (धुक्षत) पूरी करो ॥३॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या पवित्रवान् पित्रोः पुत्र इव वर्त्तमानः स वह्निर्भुवनानि पुनाति। यो धेनुं सुरेतसं वृषभं पृश्निं शुक्रम्पयश्च विश्वाहा पुनाति। यं धीरो मायया ज्ञानत्यस्य सकाशादभीष्टसिद्धिं यूयं दुक्षत ॥३॥

 

 

भावार्थः-

यथा सूर्य्यः सर्वाँल्लोकान् धरति पवित्रयति तथा सुपुत्राः कुलं शुन्धन्ति ॥३॥

जैसे सूर्य समस्त लोकों को धारण करता और पवित्र करता है वैसे सुपुत्र कुल को पवित्र करते हैं ॥३॥


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