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Mantra Rig 01.154.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 154 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 6 of Varga 24 of Adhyaya 2 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 108 of Anuvaak 21 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- विष्णुः

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

ता वां॒ वास्तू॑न्युश्मसि॒ गम॑ध्यै॒ यत्र॒ गावो॒ भूरि॑शृङ्गा अ॒यास॑: अत्राह॒ तदु॑रुगा॒यस्य॒ वृष्ण॑: पर॒मं प॒दमव॑ भाति॒ भूरि॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमव भाति भूरि

 

The Mantra's transliteration in English

tā vā vāstūny uśmasi gamadhyai yatra gāvo bhūriśṛṅgā ayāsa | atrāha tad urugāyasya vṛṣṇa paramam padam ava bhāti bhūri 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

ता वा॒म् वास्तू॑नि उ॒श्म॒सि॒ गम॑ध्यै यत्र॑ गावः॑ भूरि॑ऽशृङ्गाः अ॒यासः॑ अत्र॑ अह॑ तत् उ॒रु॒ऽगा॒यस्य॑ वृष्णः॑ प॒र॒मम् प॒दम् अव॑ भा॒ति॒ भूरि॑

 

The Pada Paath - transliteration

tā | vām | vāstūni | uśmasi | gamadhyai | yatra | gāva | bhūri-śṛṅ | ayāsa | atra | aha | tat | uru-gāyasya | vṛṣṇa | paramam | padam | ava | bhāti | bhūri 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१५४।०६

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(ता) तानि (वाम्) युवयोरध्यापकोपदेशकयोः परमयोगिनोः (वास्तूनि) वासाऽधिकरणानि (उश्मसि) कामयेमहि (गमध्यै) गन्तुम् (यत्र) यस्मिन् (गावः) किरणाः (भूरिशृङ्गाः) भूरिबहुशृङ्गाणीवोत्कृष्टानि तेजांसि येषु ते (अयासः) प्राप्ताः (अत्र) (अह) (तत्) (उरुगायस्य) बहुधा प्रशंसितस्य (वृष्णः) सुखवर्षकस्य (परमम्) प्रकृष्टम् (पदम्) प्राप्तुमर्हम् (अव) (भाति) प्रकाशते (भूरि) बहु ॥     इमं मन्त्रं यास्कमुनिरेवं व्याचष्टेः- तानि वां वास्तूनि कामयामहे गमनाय यत्र गावो भूरिशृङ्गा भूरीति बहुनोनामधेयं प्रभवतीति सतः शृङ्गं श्रयतेर्वा शृणोतेर्वा शम्नातेर्वा शरणायोद्गतमिति वा शिरसो निर्गतमिति वाऽयासोऽयनाः। तत्र तदुरुगायस्य विष्णोर्महागतेः परमं पदं परार्ध्यस्थमवभाति भूरि। पादः पद्यतेस्तन्निधानात्पदं पशुपादप्रकृतिः प्रभागपादः प्रभागपादसामान्यादितराणि पदानीति। निरु० २।७। ॥६॥

हे शास्त्रवेत्ता विद्वानो ! (यत्र) जहां (अयासः) प्राप्त हुए (भूरिशृङ्गाः) बहुत सींगों के समान उत्तम तेजोंवाले (गावः) किरण हैं (ता) उन (वास्तूनि) स्थानों को (वाम्) तुम अध्यापक और उपदेशक परम योगीजनों के (गमध्यै) जाने को हम लोग (उश्मसि) चाहते हैं। जो (उरुगायस्य) बहुत प्रकारों से प्रशंसित (वृष्णः) सुख वर्षानेवाले परमेश्वर को (परमम्) प्राप्त होने योग्य (पदम्) मोक्षपद (भूरिः) अत्यन्त (अव भाति) उत्कृष्टता से प्रकाशमान है (तत्) उसको (अत्राह) यहां ही हम लोग चाहते हैं ॥६॥

 

 

अन्वयः-

हे आप्तौ विद्वांसौ यत्रायासो भूरिशृङ्गा गावः सन्ति ता तानि वास्तूनि वां युवयोर्गमध्यै वयमुश्मसि। यदुरुगायस्य वृष्णः परमेश्वरस्य परमं पदं भूर्यवभाति तदत्राह वयमुश्मसि ॥६॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यत्र विद्वांसो मुक्तिं प्राप्नुवन्ति तत्र किञ्चिदप्यन्धकारो नास्ति प्राप्तमोक्षाश्च भास्वरा भवन्ति तदेवाप्तानां मुक्तिपदं ब्रह्म सर्वप्रकाशकमस्तीति ॥६॥

अत्र परमेश्वरमुक्तिपदवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्बोध्या ॥

इति चतुःपञ्चाशदुत्तरं शततमं सूक्तं चतुर्विशो वर्गश्च समाप्तः ॥  

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जहां विद्वान् जन मुक्ति पाते हैं वहां कुछ भी अन्धकार नहीं है और वे मोक्ष को प्राप्त हुए प्रकाशमान होते हैं, वही आप्त विद्वानों का मुक्तिपद है सो ब्रह्म सबका प्रकाश करनेवाला है ॥६॥

इस सूक्त में परमेश्वर और मुक्ति का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥

यह एकसौ चौवनवाँ सूक्त और चौबीसवां वर्ग समाप्त हुआ ॥

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