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Mantra Rig 01.154.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 154 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 24 of Adhyaya 2 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 107 of Anuvaak 21 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- विष्णुः

छन्द: (Chhand) :- त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

तद॑स्य प्रि॒यम॒भि पाथो॑ अश्यां॒ नरो॒ यत्र॑ देव॒यवो॒ मद॑न्ति उ॒रु॒क्र॒मस्य॒ हि बन्धु॑रि॒त्था विष्णो॑: प॒दे प॑र॒मे मध्व॒ उत्स॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

तदस्य प्रियमभि पाथो अश्यां नरो यत्र देवयवो मदन्ति उरुक्रमस्य हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः

 

The Mantra's transliteration in English

tad asya priyam abhi pātho aśyā naro yatra devayavo madanti | urukramasya sa hi bandhur itthā viṣṇo pade parame madhva utsa 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

तत् अ॒स्य॒ प्रि॒यम् अ॒भि पाथः॑ अ॒श्या॒म् नरः॑ यत्र॑ दे॒व॒यवः॑ मद॑न्ति उ॒रु॒ऽक्र॒मस्य॑ सः हि बन्धुः॑ इ॒त्था विष्णोः॑ प॒दे प॒र॒मे मध्वः॑ उत्सः॑

 

The Pada Paath - transliteration

tat | asya | priyam | abhi | pātha | aśyām | nara | yatra | devayava | madanti | uru-kramasya | sa | hi | bandhu | itthā | viṣṇo | pade | parame | madhva | utsaḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१५४।०५

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(तत्) (अस्य) (प्रियम्) येन प्रीणाति तत् (अभि) (पाथः) वर्त्म (अश्याम्) प्राप्नुयाम् (नरः) नेतारः (यत्र) यस्मिन् (देवयवः) ये देवान् दिव्यान् भोगान् कामयन्ते (मदन्ति) आनन्दयन्ति (उरुक्रमस्य) बहुपराक्रमस्य (सः) (हि) खलु (बन्धुः) दुःखविनाशकत्वेन सुखप्रदः (इत्था) अनेन प्रकारेण (विष्णोः) व्यापकस्य (पदे) प्राप्तव्ये (परमे) अत्युत्तमे मोक्षे पदे (मध्वः) मधुरादिरसयुक्तस्य (उत्सः) कूपइव तृप्तिकरः ॥५॥

मैं (यत्र) जिसमें (देवयवः) दिव्य लोगों की कामना करनेवाले (नरः) अग्रगन्ता उत्तम जन (मदन्ति) आनन्दित होते हैं (तत्) उस (अस्य) इस (उरुक्रमस्य) अनन्त पराक्रमयुक्त (विष्णोः) व्यापक परमात्मा के (प्रियम्) प्रिय (पाथः) मार्ग को (अभ्यश्याम्) सब ओर से प्राप्त होऊं, जिस परमात्मा के (परमे) अत्युत्तम (पदे) प्राप्त होने योग्य मोक्ष पद में (मधवः) मधुरादि गुणयुक्त पदार्थ का (उत्सः) कूपसा तृप्ति करनेवाला गुण वर्त्तमान है (सः, हि) वही (इत्था) इस प्रकार से हमारा (बन्धुः) भाई के समान दुःख विनाश करने से सुख देनेवाला है ॥५॥

 

अन्वयः-

अहं यत्र देवयवो नरो मन्दति तदस्योरुक्रमस्य विष्णोः प्रियं पाथोभ्यश्यां यस्य परमे पदे मध्व उत्सइव तृप्तिकरो गुणो वर्त्तते स हि इत्था नो बन्धुरिवास्ति ॥५॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। ये परमेश्वरेण वेदद्वारा दत्तमाज्ञामनुगच्छन्ति ते मोक्षसुखमश्नुवते। यथा जना बन्धुं प्राप्य सहायं लभन्ते तृषिता वा मधुरजलं कूपं प्राप्य तृप्यन्ति तथा परमेश्वरं प्राप्य पूर्णानन्दा जायन्ते ॥५॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो परमेश्वर की वेदद्वारा दी हुई आज्ञा के अनुकूल चलते हैं वे मोक्ष सुख को प्राप्त होते हैं। जैसे जन बन्धु को प्राप्त होकर सहायता को पाते हैं वा प्यासे जन मीठे जल से पूर्ण कुये को पाकर तृप्त होते हैं वैसे परमेश्वर को प्राप्त होकर पूर्ण आनन्द को प्राप्त होते हैं ॥५॥

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