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Mantra Rig 01.154.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 154 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 24 of Adhyaya 2 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 106 of Anuvaak 21 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- विष्णुः

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यस्य॒ त्री पू॒र्णा मधु॑ना प॒दान्यक्षी॑यमाणा स्व॒धया॒ मद॑न्ति उ॑ त्रि॒धातु॑ पृथि॒वीमु॒त द्यामेको॑ दा॒धार॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यस्य त्री पूर्णा मधुना पदान्यक्षीयमाणा स्वधया मदन्ति त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा

 

The Mantra's transliteration in English

yasya trī pūrā madhunā padāny akīyamāā svadhayā madanti | ya u tridhātu pthivīm uta dyām eko dādhāra bhuvanāni viśvā 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यस्य॑ त्री पू॒र्णा मधु॑ना प॒दानि॑ अक्षी॑यमाणा स्व॒धया॑ मद॑न्ति यः ऊँ॒ इति॑ त्रि॒ऽधातु॑ पृ॒थि॒वीम् उ॒त द्याम् एकः॑ दा॒धार॑ भुव॑नानि विश्वा॑

 

The Pada Paath - transliteration

yasya | trī | pūrā | madhunā | padāni | akīyamāā | svadhayā | madanti | ya | o iti | tri-dhātu | pthivīm | uta | dyām | eka | dādhāra | bhuvanāni | viśvā 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१५४।०४

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(यस्य) जगदीश्वरस्य मध्ये (त्री) त्रीणि (पूर्णा) पूर्णानि (मधुना) मधुराद्येन गुणेन (पदानि) प्राप्तमर्हाणि (अक्षीयमाणा) क्षयरहितानि (स्वधया) स्वस्वरूपधारणया क्रियया (मदन्ति) (यः) (उ) (त्रिधातु) त्रयः सत्वरजस्तमआदिधातवो येषुं तानि (पृथिवीम्) भूमिम् (उत) अपि (द्याम्) सूर्य्यम् (एकः) अद्वैतः (दाधार) धरति पोषयति वा (भुवनानि) (विश्वा) सर्वाणि ॥४॥

हे मनुष्यो ! (यस्य) जिस ईश्वर के बीच (मधुना) मधुरादि गुण से (पूर्णा) पूर्ण (अक्षीयमाणा) विनाशरहित (त्री) तीन (पदानि) प्राप्त होने योग्य पद अर्थात् लोक (स्वधया) अपने अपने रूप के धारण करने रूप क्रिया से (मदन्ति) आनन्द को प्राप्त होते हैं (यः) और जो (एकः) (उ) एक अर्थात् अद्वैत परमात्मा (पृथिवीम्) पृथिवीमण्डल (उत) और (द्याम्) सूर्यमण्डल तथा (त्रिधातु) जिनमें सत्व, रजस्, तमस् ये तीनों धातु विद्यमान उन (विश्वा) समस्त (भुवनानि) लोक-लोकान्तरों को (दाधार) धारण करता है वही परमात्मा सबको मानने योग्य है ॥४॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या यस्य रचनायां मधुना पूर्णाऽक्षीयमाणा त्री पदानि स्वधया मदन्ति य एक उ पृथिवीमुत द्यां त्रिधातु विश्वा भुवनानि दाधार स एव परमात्मा सर्वैर्वेदितव्यः ॥४॥

 

 

भावार्थः-

योऽनादिकारणात् सूर्यादिप्रकाशवत् क्षितीरुत्पाद्य सर्वैर्भोग्यैः पदार्थैः सह संयोज्याऽऽनन्दयति तद्गुणकर्मोपासनेनानन्दो हि सर्वैर्वर्द्धनीयः ॥४॥

जो अनादि कारण से सूर्य आदि के तुल्य प्रकाशमान पृथिवियों को उत्पन्न कर समस्त भोग्य पदार्थों के साथ उनका संयोग करा उनको आनन्दित करता है उसके गुण कर्म की उपासना से आनन्द ही सबको बढ़ाना चाहिये ॥४॥

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