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Mantra Rig 01.154.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 154 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 24 of Adhyaya 2 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 104 of Anuvaak 21 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- विष्णुः

छन्द: (Chhand) :- विराट्त्रिस्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

प्र तद्विष्णु॑: स्तवते वी॒र्ये॑ण मृ॒गो भी॒मः कु॑च॒रो गि॑रि॒ष्ठाः यस्यो॒रुषु॑ त्रि॒षु वि॒क्रम॑णेष्वधिक्षि॒यन्ति॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

प्र तद्विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो भीमः कुचरो गिरिष्ठाः यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा

 

The Mantra's transliteration in English

pra tad viṣṇu stavate vīryea mgo na bhīma kucaro giriṣṭ | yasyoruu triu vikramaev adhikiyanti bhuvanāni viśvā

 

The Pada Paath (Sanskrit)

प्र तत् विष्णुः॑ स्त॒व॒ते॒ वी॒र्ये॑ण मृ॒गः भी॒मः कु॒च॒रः गि॒रि॒ऽस्थाः यस्य॑ उ॒रुषु॑ त्रि॒षु वि॒ऽक्रम॑णेषु अ॒धि॒ऽक्षि॒यन्ति॑ भुव॑नानि विश्वा॑

 

The Pada Paath - transliteration

pra | tat | viṣṇu | stavate | vīryea | mga | na | bhīma | kucara | giri-sthā | yasya | uruu | triu | vi-kramaeu | adhi-kiyanti | bhuvanāni | viśvā 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१५४।०२

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

 

पदार्थः-

(प्र) (तत्) सः (विष्णुः) सर्वव्यापीश्वरः (स्तवते) स्तौति (वीर्येण) स्वपराक्रमेण (मृगः) (न) इव (भीमः) भयङ्करः (कुचरः) यः कुत्सितं चरति सः (गिरिष्ठाः) यो गिरौ तिष्ठति (यस्य) (उरुषु) विस्तीर्णेषु (त्रिषु) नामस्थानजन्मसु (विक्रमणेषु) विविधेषु सृष्टिक्रमेषु (अधिक्षियन्ति) आधाररूपेण निवसन्ति (भुवनानि) भवन्ति भूतानि येषु तानि लोकजातानि (विश्वा) सर्वाणि ॥२॥

हे मनुष्यो ! (यस्य) जिस जगदीश्वर के निर्माण किये हुए (त्रिषु) जन्म, नाम और स्थान इन तीन (विक्रमणेषु) विविध प्रकार के सृष्टि-क्रमों में (विश्वा) समस्त (भुवनानि) लोक-लोकान्तर (अधिक्षियन्ति) आधाररूप से निवास करते हैं (तत्) वह (विष्णुः) सर्वव्यापी परमात्मा अपने (वीर्येण) पराक्रम से (कुचरः) कुटिलगामी अर्थात् ऊंचे-नीचे नाना प्रकार विषम स्थलों में चलने और (गिरिष्ठाः) पर्वत कन्दराओ में स्थिर होनेवाले (मृगः) हरिण के (न) समान (भीमः) भयङ्कर समस्त लोक-लोकान्तरों को (प्रस्तवते) प्रशंसित करता है ॥२॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या यस्य निर्मितेषूरुषु त्रिषु विक्रमणेषु विश्वा भुवनान्यधिक्षियन्ति तत् स विष्णुः स्ववीर्येण कुचरो गिरिष्ठा मृगो भीमो नेव विश्वाँल्लोकान् प्रस्तवते ॥२॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। नहि कश्चिदपि पदार्थ ईश्वरसृष्टिनियमक्रममुल्लङ्घितुं शक्नोति यो धार्मिकाणां मित्रइवाह्लादप्रदो दुष्टानां सिंहइव भयप्रदो न्यायादिगुणधर्त्ता परमात्माऽस्ति सएव सर्वोषामधिष्ठाता न्यायाधीशोऽस्तीति वेदितव्यम् ॥२॥

कोई भी पदार्थ ईश्वर और सृष्टि के नियम को उल्लङ्घ नहीं सकता है, जो धार्मिक जनों को मित्र के समान आनन्द देने, दुष्टों को सिंह के समान भय देने और न्यायादि गुणों का धारण करनेवाला परमात्मा है वही सबका अधिष्ठाता और न्यायाधीश है, यह जानना चाहिये ॥२॥

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