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Mantra Rig 01.154.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 154 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 24 of Adhyaya 2 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 103 of Anuvaak 21 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- विष्णुः

छन्द: (Chhand) :- विराट्त्रिस्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

विष्णो॒र्नु कं॑ वी॒र्या॑णि॒ प्र वो॑चं॒ यः पार्थि॑वानि विम॒मे रजां॑सि यो अस्क॑भाय॒दुत्त॑रं स॒धस्थं॑ विचक्रमा॒णस्त्रे॒धोरु॑गा॒यः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्र वोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि यो अस्कभायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः

 

The Mantra's transliteration in English

viṣṇor nu ka vīryāi pra voca ya pārthivāni vimame rajāsi | yo askabhāyad uttara sadhastha vicakramāas tredhorugāya 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

विष्णोः॑ नु क॒म् वी॒र्या॑णि प्र वो॒च॒म् यः पार्थि॑वानि वि॒ऽम॒मे रजां॑सि यः अस्क॑भायत् उत्ऽत॑रम् स॒धऽस्थ॑म् वि॒ऽच॒क्र॒मा॒णः त्रे॒धा ऊ॒रु॒ऽगा॒यः

 

The Pada Paath - transliteration

viṣṇo | nu | kam | vīryāi | pra | vocam | ya | pārthivāni | vi-mame | rajāsi | ya | askabhāyat | ut-taram | sadha-stham | vi-cakramāa | tredhā | ūru-gāyaḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१५४।०१

मन्त्रविषयः-

अथेश्वरमुक्तिपदवर्णनमाह।

अब छः ऋचावाले १५४ एकसौ चौपनवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में ईश्वर और मुक्तिपद का वर्णन करते हैं।

 

पदार्थः-

(विष्णोः) वेवेष्टि व्याप्नोति सर्वत्र स विष्णुस्तस्य (नु) सद्यः (कम्) सुखम् (वीर्याणि) पराक्रमान् (प्र) (वोचम्) वदेयम् (यः) (पार्थिवानि) पृथिव्यां विदितानि (विममे) (रजांसि) लोकान् (यः) (अस्कभायत्) स्तभ्नाति (उत्तरम्) प्रलयादनन्तरं कारणाख्यम् (सधस्थम्) सहस्थानम् (विचक्रमाणः) विशेषेण प्रचालयन् (त्रेधा) त्रिभिः प्रकारैः (उरुगायः) य उरुभिर्बहुभिर्मन्त्रैर्गीयते स्तूयते वा ॥१॥

हे मनुष्यो ! (यः) जो (पार्थिवानि) पृथिवी में विदित (रजांसि) लोकों को अर्थात् पृथिवी में विख्यात सब स्थलों को (नु) शीघ्र (विममे) अनेक प्रकार से याचता वा (यः) जो (उरुगायः) बहुत वेदमन्त्रों से गाया जाता वा स्तुति किया जाता (उत्तरम्) प्रलय से अनन्तर (सधस्थम्) एक साथ के स्थान को (त्रेधा) तीन प्रकार से (विचक्रमाणः) विशेषकर कँपाता हुआ (अस्कभायत्) रोकता है उस (विष्णोः) सर्वत्र व्याप्त होनेवाले परमेश्वर के (वीर्याणि) पराक्रमों को (प्र वोचम्) अच्छे प्रकार कहूं और उससे (कम्) सुख पाऊं वैसे तुम करो ॥१॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या यः पार्थिवानि रजांसि नु विममे य उरुगाय उत्तरं सधस्थं त्रेधा विचक्रमाणोस्कभायत्तस्य विष्णोर्वीर्याणि प्रवोचमनेन कं प्राप्नुयां तथा यूयमपि कुरुत ॥१॥

 

 

भावार्थः-

यथा सूर्यः स्वाकर्षणेन सर्वान् भूगोलान् धरति तथा सूर्यादींल्लोकान् कारणं जीवांश्च जगदीश्वरो धत्ते य इमानसंख्यलोकान् सद्यो निर्ममे यस्मिन्निमे प्रलीयन्ते च स एव सर्वैरुपास्यः ॥१॥

जैसे सूर्य अपनी आकर्षण शक्तिं से सब भूगोलों को धारण करता है वैसे सूर्य्यादि लोक, कारण और जीवों को जगदीश्वर धारण कर रहा है। जो इन असंख्य लोकों को शीघ्र निर्माण करता और जिसमें प्रलय को प्राप्त होते हैं वही सबको उपासना करने योग्य है ॥१॥


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