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Mantra Rig 01.152.007

MANTRA NUMBER:

Mantra 7 of Sukta 152 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 7 of Varga 22 of Adhyaya 2 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 98 of Anuvaak 21 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- मित्रावरुणौ

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

वां॑ मित्रावरुणा ह॒व्यजु॑ष्टिं॒ नम॑सा देवा॒वव॑सा ववृत्याम् अ॒स्माकं॒ ब्रह्म॒ पृत॑नासु सह्या अ॒स्माकं॑ वृ॒ष्टिर्दि॒व्या सु॑पा॒रा

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

वां मित्रावरुणा हव्यजुष्टिं नमसा देवाववसा ववृत्याम् अस्माकं ब्रह्म पृतनासु सह्या अस्माकं वृष्टिर्दिव्या सुपारा

 

The Mantra's transliteration in English

ā vām mitrāvaruā havyajuṣṭi namasā devāv avasā vavtyām | asmākam brahma ptanāsu sahyā asmāka vṛṣṭir divyā supārā 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

वा॒म् मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒ ह॒व्यऽजु॑ष्टिम् नम॑सा देवौ॑ अव॑सा व॒वृ॒त्या॒म् अ॒स्माक॑म् ब्रह्म॑ पृत॑नासु स॒ह्याः॒ अ॒स्माक॑म् वृ॒ष्टिः दि॒व्या सु॒ऽपा॒रा

 

The Pada Paath - transliteration

ā | vām | mitrāvaruā | havya-juṣṭim | namasā | devau | avasā | vavtyām | asmākam | brahma | ptanāsu | sahyā | asmākam | vṛṣṭi | divyā | su-pārā 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१५२।०७

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते है।

 

पदार्थः-

(आ) (वाम्) युवाभ्याम् (मित्रावरुणा) सुहृद्वरौ (हव्यजुष्टिम्) आदातव्यसेवाम् (नमसा) अन्नेन (देवौ) दिव्यस्वभावौ (अवसा) रक्षणाद्येन कर्मणा (ववृत्याम्) वर्त्तयेयम्। अत्र बहुलं छन्दसीति शपः श्लुः। (अस्माकम्) (ब्रह्म) धनम् (पृतनासु) मनुष्येषु (सह्याः) सहनं कुर्य्याः (अस्माकम्) (वृष्टिः) दुष्टानां शक्तिबन्धिका शक्तिः (दिव्या) शुद्धा (सुपारा) सुखेन पारः पूतिर्यस्याः सा

हे (देवौ) दिव्य स्वभाववाले (मित्रावरुणा) मित्र और उत्तम जन ! जैसे मैं (वाम्) तुम दोनों की (नमसा) अन्न से (हव्यजुष्टिम्) ग्रहण करने योग्य सेवा को (आ, ववृत्याम्) अच्छे प्रकार वर्त्तूं वैसे तुम दोनों (अवसा) रक्षा आदि काम से (अस्माकम्) हमारे (पृतनासु) मनुष्यों में (ब्रह्म) धन की वृद्धि कराइये। हे विद्वान् ! जो (अस्माकम्) हमारी (दिव्या) शुद्धं (सुपारा) जिससे कि सुख के साथ सब कामों की परिपूर्णता हो ऐसी (वृष्टिः) दुष्टों की शक्ति बांधनेवाली शक्ति है उसको (सह्याः) सहो

 

अन्वयः-

हे देवौ मित्रावरुणा यथाहं वां नमसा हव्यजुष्टिमाववृत्यां तथा युवामवसाऽस्माकं पृतनासु ब्रह्म वर्द्धयेतम्। हे विद्वन् याऽस्माकं दिव्या सुपारा वृष्टिरस्ति तां त्वं सह्याः ॥

 

 

भावार्थः-

यथा विद्वांसोऽतिप्रीत्याऽस्मभ्यं विद्याः प्रदद्युस्तथा वयमेतानतिश्रद्धया सेवेमहि यतोऽस्माकं शुद्धा प्रशंसा सर्वत्र विदिता स्यादिति ॥

अत्राध्यापकोपदेशकशिष्यक्रमवर्णनादेतदर्थस्त पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्बोध्या ॥

इति द्विपञ्चाशदुत्तरं शततमं सूक्तं द्वाविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥

जैसे विद्वान् जन अति प्रीति से हमारे लिये विद्याओं को देवें वैसे हम लोग इनको अत्यन्त श्रद्धा से सेवें जिससे हमारी शुद्ध प्रशंसा सर्वत्र विदित हो

इस सूक्त में पढ़ाने और उपदेश करनेवाले तथा उन शिष्यों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥

यहां एकसौ बावनवाँ सूक्त और बाईसवां वर्ग पूरा हुआ

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