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Mantra Rig 01.152.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 152 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 6 of Varga 22 of Adhyaya 2 of Ashtak 2 of Rig Veda

Mantra 97 of Anuvaak 21 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- दीर्घतमा औचथ्यः

देवता (Devataa) :- मित्रावरुणौ

छन्द: (Chhand) :- त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

धे॒नवो॑ मामते॒यमव॑न्तीर्ब्रह्म॒प्रियं॑ पीपय॒न्त्सस्मि॒न्नूध॑न् पि॒त्वो भि॑क्षेत व॒युना॑नि वि॒द्वाना॒साविवा॑स॒न्नदि॑तिमुरुष्येत्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

धेनवो मामतेयमवन्तीर्ब्रह्मप्रियं पीपयन्त्सस्मिन्नूधन् पित्वो भिक्षेत वयुनानि विद्वानासाविवासन्नदितिमुरुष्येत्

 

The Mantra's transliteration in English

ā dhenavo māmateyam avantīr brahmapriyam pīpayan sasminn ūdhan | pitvo bhiketa vayunāni vidvān āsāvivāsann aditim uruyet 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

धे॒नवः॑ मा॒म॒ते॒यम् अव॑न्तीः ब्र॒ह्म॒ऽप्रिय॑म् पी॒प॒य॒न् सस्मि॑न् ऊध॑न् पि॒त्वः भि॒क्षे॒त॒ व॒युना॑नि वि॒द्वान् आ॒सा आ॒ऽविवा॑सन् अदि॑तिम् उ॒रु॒ष्ये॒त्

 

The Pada Paath - transliteration

ā | dhenava | māmateyam | avantī | brahma-priyam | pīpayan | sasmin | ūdhan | pitva | bhiketa | vayunāni | vidvān | āsā | āvivāsan | aditim | uruyet 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१५२।०६

मन्त्रविषयः-

पुनस्तमेव विषयमाह।

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते है।

 

पदार्थः-

(आ) (धेनवः)  (मामतेयम्) ममताया अपत्यम् (अवन्तीः) रक्षन्त्यः (ब्रह्मप्रियम्) ब्रह्म, वेदाध्ययनं प्रियं यस्य तम् (पीपयन्) वर्द्धयेयुः (सस्मिन्) स्वस्मिन्। अत्र छान्दसोवर्णलोपोवेति वलोपः। (ऊधन्) ऊधनि दुग्धाधारे (पित्वः) अन्नस्य (भिक्षेत) याचेत (वयुनानि) प्रज्ञानानि (विद्वान्) (आसा) आस्येन (आविवासन्) समन्तात् परिचरन् (अदितिम्) अविनाशिकां विद्याम् (उरुष्येत्) सेवेत

जैसे (धेनवः) धेनु गौयें (सस्मिन्) अपने (ऊधन्) ऐन में हुए दूध से बछड़ों को पुष्ट करती हैं वैसे जो स्त्री (ब्रह्मप्रियम्) वेदाध्ययन जिसको प्रिय उस (मामतेयम्) ममत्व से माने हुए अपने पुत्र की (अवन्तीः) रक्षा करती हुई (आ, पीपयन्) उसकी वृद्धि उन्नति करती हैं वा जैसे (विद्वान्) विद्यावान् जन (आसा) मुख से (पित्वः) अन्न की (भिक्षेत) याचना करे और (अदितिम्) न नष्ट होनेवाली विद्या का (आविवासन्) सब ओर से सेवन करता हुआ (वयुनानि) उत्तम ज्ञानों को (उरुष्येत्) सेवे वैसे पढ़ानेवाले पुरुष औरों को विद्या और सिखावट का ग्रहण करावें

 

अन्वयः-

यथा धेनवः सस्मिन्नूधन्भवेन दुग्धेन वत्सान् पुष्यन्ति तथा या स्त्रियो ब्रह्मप्रियं मामतेयमवन्तीः सत्य आपीपयन् यथा वा विद्वानासा पित्वो भिक्षेताऽदितिमाविवासन् वयुनान्युरुष्येत्तथाऽध्यापिका स्त्री पाठकाः पुरुषा अन्यान् विद्याशिक्षा ग्राहयेयुः ॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा मातरः स्वापत्यानि दुग्धादिदानेन वर्द्धयन्ति तथा विदुष्यस्त्रियो विद्वांसः पुरुषाः कुमारीः कुमारांश्च विद्यासुशिक्षाभ्यां वर्द्धयेरन्

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे माता जन अपने लड़कों को दूध आदि के देने से बढ़ाती हैं वैसे विदुषी स्त्री और विद्वान् पुरुष कुमार और कुमारियों को विद्या और अच्छी शिक्षा से बढ़ावें, उन्नति युक्त करें

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